अप्रैल 15, 2011

छत्तीसगढ़ सरकार के मुंह पर सुप्रीम कोर्ट का दूसरा तमाचा



‘’जनता का स्‍नेह उन्‍हें कानून का डर दिखाकर हासिल नहीं किया जा सकता।’’
-          महात्‍मा गांधी

डॉ. बिनायक सेन को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई। छत्‍तीसगढ़ सरकार ने उन पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उन्‍हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्‍यीय बेंच ने कहा, ‘’सिर्फ नक्‍सली साहित्‍य रखने पर कोई नक्‍सली नहीं बन जाता। बिनायक नक्‍सलियों के हमदर्द भले हों, लेकिन उन्‍हें देशद्रोही कतई नहीं माना जा सकता।’’ किसी भी चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार (यहां संदर्भ छत्‍तीसगढ़ सरकार से है) के मुंह पर कोर्ट का इससे बड़ा तमाचा हो नहीं सकता। शायद अब राज्‍य के सीएम रमण सिंह दूसरी बार अपने गाल पर इसका दर्द महसूस कर रहे होंगे।
यह 24 दिसंबर 2010 की बात है, जब रायपुर के एडीशनल सेशन जज बीपी वर्मा ने बिनायक सेन को देशद्रोही ठहराया था। इस फैसले से समूचा कोर्ट रूम स्‍तब्‍ध था। बिनायक की दोनों बेटियों प्रांजिता और अपराजिता के आंसू नहीं थम रहे थे। लेकिन पत्‍नी इलीना ने कहा, ‘’यह समय रोने का नहीं है। मेरा गुस्‍सा मुझे आखिर तक इंसाफ की लड़ाई लड़ने को प्रेरित करेगा।’’ गरीबों में कुपोषण के कुप्रभाव पर एमडी करने वाले डॉ. सेन ने मध्‍यप्रदेश के रसूलिया में टीबी पर भी शोध किया था। यह भी प्रमुखत: गरीबों की ही बीमारी है। 1981 में सेन ने सक्रिय तौर पर आदिवासियों की बेहतरी के लिए काम करना शुरू किया। इसी दौरान वे पीपुल्‍स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज से भी जुड़े। इलीना के साथ मिलकर उन्‍होंने 90 के दशक में एक एनजीओ रूपांतर की नींव रखी। इस दौरान उनकी मां अनुसूया ने कई बार उन्‍हें एक पेशेवर डॉक्‍टर की नौकरी के विज्ञापन भेजे, लेकिन बिनायक कहते, ‘’गांव के गरीबों की सेवा मेरा मकसद है। मैं अपनी राह चुन चुका हूं।’’ ऐसा समर्पित व्‍यक्‍ति कैसे देशद्रोही हो सकता है ?
बिनायक सेन का कसूर क्‍या था ? सिर्फ इतना ही कि उन्‍होंने छत्‍तीसगढ़ सरकार के द्वारा बनाए गए सलवा जुडूम को मानवाधिकार विरोधी बताया ? रमण सरकार की यह वही फौज है, जिसने अब तक 644 गांवों को तबाह कर 60 हजार से ज्‍यादा आदिवासियों को उनकी जमीन से उजाड़ने का काम किया है। इसका सबसे ज्‍यादा फायदा राज्‍य सरकार को हुआ, जिसने खाली पड़ी जमीन खदान माफिया और औद्योगिक संस्‍थानों के हवाले कर दी। इन बेकसूर आदिवासियों का कोई रहनुमा नहीं था, पर बिनायक आगे आए, उन्‍होंने नि:स्‍वार्थ भावना से इस अत्‍याचार का विरोध किया। उसी समय राज्‍य के तत्‍कालीन डीजीपी ओपी राठौर ने खुलेआम मीडिया के सामने बिनायक को ‘’देख लेने’’ की धमकी दी थी। अंजाम वहीं पर तय हो गया था। 14 मई 2007 को गिरफ्तार होने के दो साल बाद 25 मई 2009 को सुप्रीम कोर्ट में जब मामला आया तो बिनायक को 40 सेकंड में जमानत मिल गई।
शुक्रवार 15 अप्रैल 2011 को सुप्रीम कोर्ट में फिर बिनायक को जमानत मिली है। रमण सरकार को इस दूसरे तमाचे के बाद होश आ जाना चाहिए। बस्‍तर के नक्‍सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के मोरापल्‍ल्‍ी, तिमापुर और तारमेटा जैसे आदिवासी बहुल गांवों में सीआरपीएफ और राज्‍य सरकार के कोबरा और कोया कमांडो दस्‍ते ने हत्‍या, बलात्‍कार, लूटपाट और आगजनी को अंजाम दिया। नक्‍सलियों से लड़ने के लिए रमण सरकार ने स्‍पेशल पुलिस अफसरों (एसपीओ) और कोया कमांडो के रूप में गुंडों की फौज खड़ी कर रखी है। इनमें से ज्‍यादातर पर बलात्‍कार और हत्‍या के आरोप हैं, पर पुलिस की नजर में ये भगोड़े हैं। यह दुनिया की ऐसी पहली अवैध फौज होगी, जिसे बलात्‍कार, लूटपाट और निहत्‍थे आदिवासियों की जान लेने के लिए सरकार से हर माह 3000 रुपए की तनख्‍वाह मिलती है। लोगों को सस्‍ता चावल बांटकर ‘’चाऊर वाले बाबा’’ का मुखौटा पहनने वाले रमण सिंह की असल छवि नरेंद्र मोदी से कहीं अलग नहीं है। क्‍या यह देशद्रोह नहीं है ? क्‍या यह सरकारी नक्‍सलवाद नहीं है ? नक्‍सली अगर छत्‍तीसगढ़ में भू-माफिया और आदिवासियों को उजाड़ने वाले औद्योगिक संस्‍थानों के विरोध में हथियार उठाए हुए है तो रमण सरकार अपनी ही प्रजा को उजाड़ रही है। इन कोया कमांडो और एसपीओ का बस्‍तर में इस कदर खौफ है कि लोग अपनी सारी कमाई को शरीर से बांधकर जीते हैं।
रमण के गुंडों की फौज आदिवासियों को नक्‍सल समर्थक बताकर उनकी जब चाहे जान ले लेती है, उनकी बहू-बेटियों को सरे बाजार निर्वस्‍त्र किया जाता है। लूटपाट के लिए महिलाओं के ब्‍लाउज तक फाड़ दिए जाते हैं। अब तो नक्‍सलियों को मार पाने में नाकाम सीआरपीएफ भी गुंडागर्दी के खेल में शामिल हो रही है। भाजपा के सुशासन और शुचिता के नारे का देशभर में तकरीबन यही हश्र है। मगर ‘’चाऊर वाले बाबा’’ और केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम को इससे क्‍या फर्क पड़ता है। उन्‍हें डर तो इस बात का है कि बिनायक सेन या स्‍वामी अग्‍निवेश जैसा कोई शख्‍स आदिवासियों के समर्थन में आगे न आ जाए। जाहिर है, बिनायक को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है। कदम-कदम पर उनके सामने खतरे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के लगातार तमाचों ने रमण सिंह का गाल यदि लाल किया है तो इसकी असलियत तेजी से देश के सामने आ रही है। इस जंग में बिनायक अकेले नहीं हैं। अगर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ पूरा देश एकजुट हो सकता है तो रमण सरकार के सरकरी आतंकवाद के खिलाफ भी लोग जुटेंगे। ... और तब सीएम के गालों की ‘’लाली’’ और भी देखने लायक होगी।

अहमदाबाद का सर्किट हाऊस, मार्च 1922 : महात्‍मा गांधी ने अपने ऊपर लगे देशद्रोह (सेक्‍शन 124ए आईपीसी) के जवाब में कहा था, ‘’यह नागरिक अधिकारों का दमन करने के लिए राजनेताओं का ब्रह्रास्‍त्र है। मुझे मालूम है कि भारत में यह ज्‍यादातर देशभक्‍तों के खिलाफ आजमाया गया है। इसलिए मैं देशद्रोह के इस आरोप को एक सम्‍मान मानता हूं।’’

अप्रैल 12, 2011

पूनम की आबरू क्यों बेचना चाहती है मीडिया ?

ग्‍लैडरैग्‍स मॉडल पूनम पांडेय यह कहकर फंस गई हैं कि वर्ल्‍ड कप फाइनल में भारतीय क्रिकेट टीम के जीतने पर वे न्‍यूड हो जाएंगी। यह टशन कुछ-कुछ ऑस्‍ट्रलियाई मैदानों पर 10-15 साल पहले के उन दृश्‍यों से मेल खाता है, जब अपनी टीम की जीत से रोमांचित कुछ दर्शक बिना कपड़ों के मैदान में उतर जाते थे। भारतीय मीडिया ने ऐसे सीन को दिनभर कैश करवाया था। हालांकि, पूनम ने यह वादा पब्‍लिसिटी के लिए किया था और जब टीम इंडिया वाकई में जीत गई तो इज्‍जत बचाने के लिए वह भाग खड़ी हुई। अब मीडिया ने उसे फिर पकड़ा है और पूछ रही है- ‘’ मैडम, आप न्‍यूड कब होंगी ?’’
ऐसा क्‍यों ?  पूनम की आबरू के पीछे क्‍यों पड़ी है मीडिया ? क्‍या वह सार्वजनिक जीवन में न्‍यूडिटी को बढ़ावा देना चाहती है ? ै ती  वजनिक जीवन में न्‍यूडिटि अगर ऐसा है तो क्‍या यह मीडिया का नैतिक पतन नहीं है ? नब्‍बे के दशक में ममता कुलकर्णी की टॉपलेस फोटो और फिर मधु सप्रे की लगभग न्‍यूड तस्‍वीरों पर भारी हल्‍ला मचा था। तब विरोध की शुरुआत मीडिया ने ही की थी, पर फायदा हुआ मैगजीन के प्रकाशकों को। ये पत्रिकाएं धड़ल्‍ले से बिकीं और इन अभिनेत्रियों के पोस्‍टर बॉयज हॉस्‍टलों से लेकर बेडरूम तक की शान बन गए। अब तो शराब कंपनियां और औरत की खूबसूरती के नाम पर टू-पीस में उनकी तस्‍वीरें कवर पेज पर छापने वाली ग्‍लैडरैग्‍स जैसी पत्रिकाएं बिना किसी रोक-टोक के न्‍यूडिटी का धड़ल्‍ले से प्रचार करती हैं, कैलेंडर तब बनते हैं। यह कुछ कंपनियों की व्‍यावसायिकता हो सकती है, पर मीडिया इसे फॉलो क्‍यों कर रही है ? अगर पूनम ने अपना वादा नहीं निभाया तो क्‍या ? प्रधानमंत्री से लेकर राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री और निगम पार्षद तक चुनाव से पहले आम जनता से कुछ ऐसा ही वादा करते हैं, पर मीडिया उसे पूनम की तरह फॉलो क्‍यों नहीं करती ? क्‍या वादाखिलाफी करने वाले देश के राजनेता आम जनता के सामने पूनम से कम नंगे हैं ?
वजह साफ है, नेताओं का नंगापन मीडिया के लिए बिकाऊ नहीं है, पर यदि वह पूनम के शरीर पर बचे चंद कपड़ों (ग्‍लैडरैग्‍स के कवर और किंगफिशर के कैलेंडर में पूनम ने इतने ही कपड़े पहने हैं) को भी उतरवा पाई तो उसकी जेब भर जाएगी। बरसों पहले आई मिथुन चक्रवर्ती की फिल्‍म ‘दलाल’ में राज बब्‍बर ने जो किरदार निभाया था, वह मीडिया की हालिया भूमिका से बेहद मेल खाता है। खासतौर पर वेब पत्रकारिता की दुनिया बड़ी तेजी से सैक्‍स, चटपटी खबरों, रेप और गरमा-गरम वीडियो में सिमटती जा रही है। नैतिकता और विश्‍वसनीयता के मामले में रेगिस्‍तान में तब्‍दील होते जा रही मीडिया की जमीन पर ये मसाले कैक्‍टस में उगे फूलों जैसे हैं। पूनम के बहाने मीडिया इस बहार को कायम रखना चाहती है, फिर चाहे इसके लिए उसे किसी भी हद से क्‍यों न गुजरना पड़े। लेकिन कैक्‍टस में कांटे भी होते हैं, जो इन ‘फूलों’ को तोड़ते समय हाथ में चुभ भी सकते हैं। लिहाजा मीडिया को नए हथकंडे अपनाने पड़ेंगे, उसे कैमरे के साथ बेडरूम तक में घुसना होगा, रेप का लाइव टेलीकास्‍ट करना होगा। औरत के जिस्‍म से सिर्फ कपड़े ही नहीं, बोटियां भी नोंचनी होंगी। क्‍या मीडिया ऐसा करेगी ? पूनम के मामले में उसकी हालिया भूमिका को देखकर तो यही लगता है कि वह ऐसा कर भी सकती है। क्‍यों, आपका क्‍या ख्‍याल है ?

इरोम शर्मिला और अन्ना हज़ारे...एक कविता

आज मेरा रोम रोम चीख रहा है, इरोम तुम्हारे लिए 

चीख पुकार तो कब से दबी थी, गुस्सा भी चीख चीख के निकला था 

VT स्टेशन पे तुम्हारी रिहाई की गुहार लगाकर, 
मानों तन और मनं ऐसा थरका था
लोगों को तुम्हारे बारे में बताना, 
लोगों को AFSPA काले कानून के बारे में बता कर
मानो मनं कुछ तो हल्का हुआ था
लेकिन कुछ दिन से इस देश की गुहार देखकर, 
अन्ना हजारे पर प्यार देख कर
देश के कोने कोने से भर्ष्टाचार की यह एक आवाज़ सुनकर, खुश तो हूँ, 

पर मेरा दिल चीख चीख के रो रहा है, 
मेरा दिमाग, मेरा तन.... इस क्रांति पे खुश है
पर मेरा दिल मेरा साथ नहीं है, 
मेरा दिल तम्हारे पास है इरोम 

वह तुम्हारे लिए रो रहा है
वह इस देश को समझ नहीं पा रहा है, 
आखिर एक दिल है......
तुम 10 साल से भी ज्यादा समय से भूख हड़ताल पे हो, 

तुम्हारे साथ एक भी भारतवासी नहीं आया
तुम AFSPA के काले कानून के खिलाफ हो, 
तुम्हें किसी ने नहीं अपनाया 

किसी को मत बताना इरोम, यह एक ऐसी पहेली है 

जिसका जवाब इंसानों के साथ बदलता हैं
हम अन्ना हजारे के साथ है, यह हमारी देश भक्ति है 

हम अन्ना हजरे के साथ है, हम आम जनता के साथ है
जब हम तुम्हारे साथ हैं तो देशद्रोही है

जब तुम्हारे साथ हैं, हम फ़ौज और जवानों के खिलाफ हैं
हम इस देश की सुरक्षा के खिलाफ हैं
भ्रष्टाचार तो बचपन से हमें, हमारी किताबों में भी एक गलत चीज़ है बताया गया है पर इरोम, 
देशभक्ति हमें, केवल अपने देश को बचाना ही सिखाएगी 

देश, फ़ौज , पुलिस- देश भक्ति का अटूट अंग बन गए हैं
वह मेरी तुम्हारी लड़ाई में हमारे दुश्मन बन गए हैं
भ्रष्टाचार में लाखों करोड़ों के घपले हैं, 
पर AFSPA जैसे काले कानून के कारण
इस देश भक्ति के कारण, 
हजारों देशवासी मौत की नीद सो गए गए है 

उनके मरने से उनके परिवार भी मर गए हैं, 

और हम सब उनको आतंकवादी के नाम देकर....
देशभक्ति का प्रमाण देकर कहीं सो गए
इरोम, हम सरकार की इस बर्बरता को, 
देशभक्ति के परदे में देख नहीं पाते
कब हमारे देश वासी जागेंगे, 
और हम देशवासी बाद में , पहले इंसान है
इस एहसास को जान पायेंगे, कब इरोम कब
कब हजारों लाखों तुम्हारे साथ भी
भूख हड़ताल पे जायेंगे , 

कब इरोम कब, हमारे देशवासी, इस देशभक्ति का, मुखोटा हटाएँगे
अन्ना हजारे तुम्हारी जीत हो गयी है, तुम्हारे 85 घंटों के अनशन से 

लोकपाल बिल आएगा..., 
इरोम शर्मीला के दशक के अनशन पे
AFPSA हटा नहीं है, अन्ना क्या आप इरोम के साथ बैठेंगे ?
क्या आप कानून के नाम पर जो लहू बह रहा है ?
उसको रोक पाएंगे ?

अप्रैल 09, 2011

अभी लड़ाई बाकी है


सरकार ने आखिर अन्‍ना हजारे की मांगें मान लीं और चार दिन से जारी उनका अनशन टूटा। जिन दो मांगों पर गतिरोध बना हुआ था, उन्‍हें सरकार ने एकाएक मान लिया, रातों-रात अधिसूचना प्रकाशित की गई और आज सुबह प्रधानमंत्री के बयान के बाद इसे अन्‍ना के प्रतिनिधि स्‍वामी अग्‍निवेश को सौंप दिया गया। इस तरह देश की आम जनता ने आजादी के बाद शासन की निष्‍क्रियता के खिलाफ छेड़ी दूसरी जंग शांतिपूर्ण तरीके से जीत ली। इसे जनतंत्र की जीत कहा जाए या फिर आधुनिक भारत के गांधी अन्‍ना हजारे के संकल्‍प की विजय, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्‍या ये लड़ाई आगे भी जारी रह सकेगी ? लगातार खस्‍ताहाल हो रहा देश का प्रशासनिक तंत्र क्‍या अन्‍ना की इस लड़ाई से बदल पाएगा ? यह सवाल कल मेरी एक महिला पत्रकार मित्र ने पूछा था।
यह सवाल यहां उठना इसलिए लाजिमी है, क्‍योंकि देश में पहली बार सिविल सोसायटी और सरकार मिलकर नीतियां बनाएगी। जन संगठन या साफ शब्‍दों में कहें तो एनजीओ लोगों के हक की लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन वे सरकार को कभी इस तरह से नहीं झुका सके, जैसा कि अन्‍ना ने महज चार दिन में कर दिखाया। साफ तौर पर यहां छवि का भी सवाल है। सिविल सोसायटी के तकरीबन हर अभियान से लोग तो जुड़े पर उनकी आवाज दिल्‍ली तक नहीं पहुंच सकी। इसलिए, क्‍योंकि देश के मध्‍यम वर्ग ने उसमें सुर नहीं मिलाया। दरअसल यही मध्‍यम वर्ग सरकार को चलाता है, देश की समूची अर्थव्‍यवस्‍था इसी वर्ग की खपत पर टिकी है। अनशन के पहले दिन से अन्‍ना को सिविल सोसायटी से समर्थन दिया। लेकिन भ्रष्‍टाचार के खिलाफ इस जन आंदोलन की खबर जब आग की तरह फैली तो अब तक सब-कुछ जानते समझते हुए भी सरकारी की नाकामियों को झेल रहा मध्‍यम वर्ग भी उठ खड़ा हुआ। हमें यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एक हफ्ते पहले ही भारत ने क्रिकेट का विश्‍व कप जीता है और यह खेल भी मुख्‍यत: मध्‍यम वर्ग का ही है। खुशी, हौसला और इस विश्‍वास से कि हां, हम किसी को भी झुका सकते हैं, मध्‍यम वर्ग हजारों की संख्‍या में सड़कों पर उतर आया।
शायद अन्‍ना ने भी इस सच्‍चाई को समझा है। इसीलिए उन्‍होंने अगली लड़ाई देश की चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए शुरू करने का ऐलान कर दिया है। विनोबा भावे ने एक बार कहा था कि अगर जन प्रतिनिधि जनता के भरोसे पर खरे न उतरें तो उन्‍हें वापस बुला लिया जाना चाहिए। राइट टू रीकॉल की यह व्‍यवस्‍था विनोबा युग के बाद कुछ स्‍थानों पर सामने आई है, पर एक कानूनी प्रावधान के बतौर नहीं। तो सवाल यह है कि अन्‍ना की अगली लड़ाई को इस मजबूत मध्‍यम वर्ग का कितना समर्थन मिलेगा ? फिलहाल अन्‍ना के पास इसका पुख्‍ता जवाब न हो, लेकिन वे जानते हैं कि अब देश की तस्‍वीर को तेजी से बदलने का वक्‍त आ गया है। यही वजह है कि वे जन लोकपाल बिल को संसद के आगामी मॉनसून सत्र में पारित करवाना चाहते हैं। अन्‍ना को मालूम है कि पढ़े-लिखे मध्‍यम वर्ग ने अपने भरोसे का जो ब्‍लैंक चेक उन्‍हें थमाया है, उसे अधिकतम छह माह के भीतर ही कैश करवाना होगा। यह ‘फटाफट’ युग है। इसे जिंदगी का हिस्‍सा बनाने वाला मध्‍यम वर्ग ब्रांड इमेज और विश्‍वसनीयता का मुरीद है। भ्रष्‍टाचार का पोषण कालेधन को सफेद बनाने वाली ‘वॉशिंग मशीन’, यानी चुनाव प्रणाली से होता है, लिहाजा अन्‍ना ने इसे सुधारने का संकल्‍प लिया है। चुनाव प्रणाली में सुधार की मांग मध्‍यम वर्ग ने काफी पहले उठाई थी, लेकिन दलगत राजनीति के अपने स्‍वार्थ हैं। सो, सरकार ने पंचायती राज का ढिंढोरा पीटकर इसे खामोश करने की कोशिश की। लेकिन देखा जाए तो इस पूरी प्रणाली का सबसे बुरा असर ग्रामीण गरीब आबादी पर पड़ा है, जो आज भी अपने अधिकारों से वंचित है। सड़क, साफ पानी, बिजली, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और कुपोषण ने जितना गरीबों को प्रभावित किया है, उतना उस मध्‍यम वर्ग को नहीं, जो अपने जीने की जरूरतें कहीं न कहीं से पूरी कर लेता है। आने वाले छह माह में अन्‍ना अगर अपनी दूसरी जंग भी छेड़ देते हैं, तो मध्‍यम वर्ग भले ही उनके साथ हों पर समाज के उन गरीब, कमजोर तबके का क्‍या जो तकरीबन हर रोज भूखे पेट अनशन करने और इस व्‍यवस्‍था को कोसने पर मजबूर है ?
जाहिर है अन्‍ना की लड़ाई समाज के सबसे अंतिम व्‍यक्‍ति तक नहीं पहुंच सकी है। अगली लड़ाई में ऐसा न हो, इसके लिए अन्‍ना को अपने समर्थकों के साथ मिलकर जंतर-मंतर से बड़ा मैदान तैयार करना होगा। जंतर-मंतर से याद आया कि अन्‍ना के समर्थन में महाराष्‍ट्र का एक मजदूर भी अनशन पर बैठा था। इस मजदूर के पास मनरेगा का जॉब कार्ड था, लेकिन उसे दो साल में एक बार भी काम नहीं मिला। हालांकि, उसके नाम से कई अपात्र लोगों ने मजदूरी हथिया ली थी। इस मजदूर के परिवार में भूखों मरने की नौबत है। सो उसने सोचा कि घर पर भूखे मरने से बेहतर है कि अन्‍ना के साथ अनशन किया जाए। यही वह जज्‍बा है जो सिर्फ गरीब के भीतर नजर आएगा, क्‍योंकि उसके पास जीने व अपना आत्‍मसम्‍मान बचाने का इसके सिवा और कोई विकल्‍प नहीं है। वह सरकारों का सबसे आसान वोट बैंक तो है, लेकिन इसके बदले में उसे पिछले 67 साल से कुछ नहीं मिला।
जंतर-मंतर में ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं थी, जो गांधी टोपी पहने हुए थे और जिस पर लिखा था ‘’ मैं अन्‍ना हूं ‘’। क्‍या वाकई ऐसा है ?  कहीं यह उस ब्रांड का प्रतीक तो नहीं, जिसे मध्‍यम वर्ग को निशाना बनाकर बाजार ने खड़ा किया हो। बॉलीवुड के कुछ फिल्‍मकार और कथाकार शायद इस बारे में सोच भी रहे हों। लेकिन इस जंग को बिकाऊ मसाला बनाने से इसकी साख पर सवाल खड़े हो सकते हैं। ऐसा हुआ तो उस गरीब का भरोसा जुटाना और भी मुश्‍किल हो जाएगा, जो अब अपने ही समाज और व्‍यवस्‍था पर से विश्‍वास खो चुका है। अन्‍ना को यह भी सोचना है, क्‍योंकि समूचे देश की निगाहें उन पर टिक गई हैं, लोगों की उम्‍मीदें आसमान छू रही हैं। अन्‍ना को इस बात का पहले ही अहसास था और इसीलिए उन्‍होंने एक बेहद गरीब के हाथ से जूस का गिलास स्‍वीकार करने की घोषणा की थी, पर पीया एक नन्‍हीं बालिका के हाथों। जंतर-मंतर में उमड़ी हजारों की भीड़ में आम आदमी कहलाने वाला एक भी गरीब नहीं मिला। एक और नजरिया यह भी हो सकता है कि गरीबी अब एक समस्‍या ही नहीं, बल्‍कि राजनैतिक मुद्दा भी है और अन्‍ना इसे भी जानते हैं। वे अपने पूरे पत्‍ते अभी खोलना नहीं चाहते, सरकार को ऐसा कोई संकेत भी देना नहीं चाहते कि सामाजिक सरोकारों को राजनैतिक मुद्दा बनाना उनका मकसद है। ऐसा करने पर सरकार और दलगत राजनीति से उनकी सीधी भिड़ंत हो जाएगी और अन्‍ना ऐसा नहीं करना चाहते। पर क्‍या उनके साथ जुड़े संगठनों की सोच भी यही है ? जाहिर है, अभी लड़ाई लंबी चलेगी।

अप्रैल 03, 2011

टीम इंडिया की जीत से मिले सबक


हमारे देश में क्रिकेट एकमात्र ऐसा खेल है, जिस पर शायद हर व्‍यक्‍ित कुछ भी कहने का हक रखता है। यानी कि जितने मुंह, उतनी बातें। टीम जीते तो तारीफ और न जीते तो आलोचनाओं की भरमार। अब जबकि वर्ल्‍ड कप की चमचमाती ट्रॉफी टीम इंडिया के हाथ में है, देश के 121 करोड़ लोगों की जुबां पर सिर्फ और सिर्फ तारीफों के स्‍वर ही हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय क्रिकेट टीम ने देशवासियों के सपने को 28 साल बाद एक बार फिर पूरा किया है। लेकिन इस जीत के पीछे के सबक को हमें जीत के उल्‍लास में नहीं भूलना चाहिए। कौन से सबक ? और क्‍यों ? मेरा, आपका, इस समाज और देश का इससे क्‍या नाता ? इन सारे सवालों का जवाब छिपा है महेंद्र सिंह धोनी की कप्‍तानी में। समय-समय पर उन्‍होंने अपनी इस गजब की सोच को मीडिया के सामने रखा भी, लेकिन खुशी के इन पलों में हमें उन्‍हें एक बार फिर दोहराने की जरूरत है।

सबक-1 : सही समय पर 100 परसेंट दो
कैसे - पूरे टूर्नामेंट में आउट ऑफ फॉर्म चल रहे धोनी ने फाइनल में ऊपर के क्रम में उतरकर रन बरसाए।
तो क्‍या हुआ ? असल में यही नेतृत्‍व गुण है। कॉर्पोरेट जगत और राजनेताओं को इससे सबक लेना चाहिए। एयरकंडीशंड केबिन में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें सोचने और दूसरों की गलतियां निकालने से ही काम नहीं चलता। निर्णायक मौके पर खुद आगे आकर अपनी जिम्‍मेदारी निभानी चाहिए। घर में अभिभावकों के लिए भी यही सबक काम आएगा।

सबक - 2: भरोसा करो, नतीजा निकलेगा
कैसे - आशीष नेहरा, हरभजन और युवराज पर दांव सही लगा।
तो क्‍या हुआ ? असल में यही भरोसा हमें आपस में एकजुट रखता है। मौका पड़ने पर अपनी जिम्‍मेदारी निभाने और 100 फीसदी परफॉर्म करने के लिए प्रेरित करता है। इससे भी बड़ी बात यह कि यह सहयोगियों में एक-दूसरे के प्रति सम्‍मान को बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर दूसरे की जिम्‍मेदारी अपने कंधों पर उठाने की सीख भी देता है। सहवाग और सचिन के सस्‍ते में आउट होने के बाद विराट, गंभीर, धोनी और युवराज ने यही किया। यही टीम वर्क है। काश ! देश के 100 करोड़ लोग इस सबक को अपना सकें।

सबक - 3: दबाव में भी कूल रहो
कैसे - कप लाना है, हमें कप चाहिए, जैसे जुमलों से मीडिया ने सेमीफाइनल के पहले से ही दबाव बनाना शुरू कर दिया था। इतना काफी नहीं पड़ा तो दर्शक दीर्घा में प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति और फिल्‍म स्‍टारों का जमघट लगा। देशवासियों की उम्‍मीदें आसमान छू रही थीं। सब्र का बांध टूटा जा रहा था। क्रिकेट के कई पंडित टीम की कमजोरियों और मजबूती पर कयासबाजी कर रहे थे। पर धोनी कूल रहे। उन्‍होंने आलोचनाओं की परवाह नहीं की। टीम को इन सबसे दूर रखा। अपने विश्‍वास का दामन नहीं छोड़ा।
तो क्‍या हुआ ? मुश्‍िकल घड़ी में देश, समाज और परिवार में कितने लोग इतना धैर्य दिखा पाते हैं ?

सबक- 4 : हम किसी से नहीं डरते
कैसे - ऑस्‍ट्रेलिया, पाकिस्‍तान और आखिर में श्रीलंका। सबको चित किया। पहली बॉल से ही धावा बोला। यह भारतीय युवाओं को एक नए चरित्र को अपनाने का सबक देता है। जीत के बाद हुंकार और जीत से पहले ललकार। यह दबंगई नहीं, बल्‍िक जोश, हौसले और विश्‍वास की पहचान है।
तो क्‍या हुआ ? भ्रष्‍टाचार, लालफीताशाही, चापलूसी (खासकर कॉर्पोरेट में), शॉर्टकट और सिस्‍टम की नाकामी के खिलाफ युवाओं को पूरे दमखम के साथ इस सबक को अपनाने की जरूरत है। अन्‍याय, अत्‍याचार के खिलाफ देश की बेटियों को भी निडर होकर आगे आना होगा।

सबक -5 : आज की सोचो, कल की फिक्र छोड़ो
कैसे - धोनी मैच-दर-मैच अपनी रणनीति बनाते हैं। वे लंबी रणनीतियां नहीं बनाते। यह उनकी सूझबूझ का परिचायक है। क्रिकेट अनिश्‍िचतताओं का खेल है। आज अच्‍छा करेंगे तो कल बेहतर होगा, जीतना आसान होगा। निरंतरता बनी रहेगी। जीत की आदत हो जाएगी।
तो क्‍या हुआ ? स्‍कूल-कॉलेज की पढ़ाई से लेकर करियर प्‍लानिंग और फिर घर-गृहस्‍थी की योजना बनाने तक, हम लंबी योजना बनाकर चलते हैं। सपने देखना अच्‍छी बात है, पर आज को साकार करना उससे कहीं अधिक अहम है। ऐसा नहीं किया तो सपना कभी पूरा नहीं होगा। राजनेताओं को इससे खास सबक लेना चाहिए, जो जनता को पांच साल के सपने दिखाते हैं, पर आज को संवारने के लिए पहला कदम भी ठीक से नहीं रख पाते।

यंगिस्‍तान का नया चेहरा ?



आज नवसंवत्‍सर में प्रवेश करने से पहले दो अहम बातें सामने आई हैं। पहली बात तो यह हमारी आबादी के बढ़ने की रफ्तार 4;1 फीसदी कम हुई है और दूसरी बात यह है कि देश अब क्रिकेट का वर्ल्‍ड चैंपियन है। इन दोनों बातों में एक कॉमन बात यह है कि इनमें युवा पीढ़ी का बड़ा योगदान है। जनगणना 2011 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक युवाओं की आबादी बढ़कर 45 प्रतिशत को पार करने की उम्‍मीद है। यानी तकरीबन आधे भारत को यंगिस्‍तान कहा जा सकता है। आने वाले दो साल में यह तेजी से पुरानी पीढ़ी को पीछे धकेल देगा। फिलहाल देश, समाज और परिवार का रिमोट कंट्रोल इसी पुरानी पीढ़ी के हाथों में है।  जहां भी शिक्षित, नौकरीपेशा या कारोबारी युवा पीढ़ी ने समाज और परिवार की बागडोर संभाली है, वहां पुराने पड़ चुके सिस्‍टम के खिलाफ बगावत के सुर और नवाचार के तीखे तेवर साफ नजर आते हैं।

धोनी एंड कंपनी की वर्ल्‍ड कप जीत में भी यह बात नजर आई कि हमारे युवा खिलाड़ी अपने तरीके से खेलना चाहते हैं। उन्‍हें किसी की उंगली पकड़कर चलना पसंद नहीं। खेल के मूलभूत सिद्धांतों में नए जमाने के हिसाब से फेरबदल कर उन्‍होंने अपना तरीका खोज निकाला है, जो निश्‍िचत रूप से मैच जिताऊ है। इससे देश तो गौरवान्‍िवत हुआ ही, साथ में उस यंगिस्‍तान का नया चेहरा भी सामने आया जो पुरानी पीढ़ी से कुछ अलग, कुछ  नया और कुछ बड़ा करने का हौसला रखता है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्‍या उभरते हुए यंगिस्‍तान के इस चेहरे को एक नए भारत का पर्यायवाची मानना ठीक होगा ? हाथ में तिरंगा लहराते हुए जीत का जश्‍न मनाते यंगिस्‍तान में इतनी समझ और इतना कौशल है कि आगे चलकर देश को चलाने की चुनौती से निपट सके ? अगर इसमें अभी थोड़ा संशय नजर आता है तो निश्‍िचत तौर पर कहना होगा कि तस्‍वीर साफ नहीं है। तो फिर क्‍या होगी देश की दशा और दिशा ? आबादी के मामले में हम 2025 तक चीन को पीछे छोड़कर नंबर वन हो जाएंगे। यह जीत नहीं है, क्‍योंकि तब गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और असंतुलित विकास की चुनौतियां और मुश्‍िकल होंगी। पर एक अच्‍छी बात यह रहेगी कि भारत के पास और अधिक युवा कंधे होंगे, क्‍योंकि चीन की जनसंख्‍या वृद्धि दर एक फीसदी से भी कम है। नतीजतन वहां बुजुर्गों की आबादी लगातार बढ़ रही है।

असल में देश को इस समय ऐसे यंगिस्‍तान की जरूरत है जो भ्रष्‍टाचार और राजनेताओं के कुशासन के खिलाफ लड़ सके। दलगत राजनीति की खामियों को दूर कर कार्यपालिका को जनता के प्रति और जवाबदेह बना सके। इसके लिए जहां मुमकिन हो, पुरानी पीढ़ी को पीछे हटकर आगे का रास्‍ता साफ करना होगा। वर्ल्‍ड कप जीतने के बाद धोनी से अपना सिर मुंडवा लिया, क्‍योंकि उन्‍होंने मन्‍नत मांगी थी। और भी कई खिलाड़ियों ने ईश्‍वर से प्रार्थना की। साफ है कि नई पीढ़ी ने अपनी जड़ों, यानी सांस्‍कृतिक-धार्मिक परंपराओं से मुंह नहीं मोड़ा है- जैसा कि पुरानी पीढ़ी हमेशा आरोप लगाती रही है। उसके सामने अब कोई आदर्श नहीं है, क्‍योंकि पुरानी पीढ़ी ने ऐसे कोई आदर्श स्‍थापित नहीं किए। तो क्‍या धोनी एंड कंपनी की कामयाबी को युवा भारत, अर्थात यंगिस्‍तान के लिए नया आदर्श माना जाए ?

काफी हद तक यह मुमकिन है कि आने वाली पीढ़ी देश का नाम रोशन करने वाले ऐसे ही युवाओं को अपना आदर्श बनाएगी। इसलिए भी क्‍योंकि ये उन राजनेताओं, नौकरशाहों, सिर्फ अपने लिए लाखों रुपए कमाने व उड़ाने वाले कारोबारियों की औलादें नहीं हैं, जो शराब-शबाब के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। ये उन माता-पिता की संतानें भी नहीं हैं, जिनके दामन पर रिश्‍वतखोरी का दाग लगा है। बाप की बीएमडब्‍लू या महंगी एसयूवी पर सवार होकर नशे में लड़कियों को छेड़ने वाले उस युवा पीढ़ी के आदर्श कभी नहीं बन सकते, जिसके पास खोने को कुछ नहीं, पर छूने को सारा आसमां है।

तो क्‍यों न इस नवसंवत्‍सर के पहले दिन पुरानी पीढ़ी भी यंगिस्‍तान के बदलते चेहरे और उसकी सोच को एक नए सकारात्‍मक नजरिए से देखे और उसे लगभग 45 करोड़ युवाओं का आदर्श बनने का मौका दे। अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ खेल ही नहीं, बल्‍िक देश की प्रगति के हर मापदंड पर हम वर्ल्‍ड चैंपियन होंगे। ... और तब सड़कों पर हमेशा तिरंगा लहराता नजर आएगा। जय हो, इंडिया-इंडिया और वंदे मातरम के नारे तभी सही मायनों में सार्थक होंगे।