आज नवसंवत्सर में प्रवेश करने से पहले दो अहम बातें सामने आई हैं। पहली बात तो यह हमारी आबादी के बढ़ने की रफ्तार 4;1 फीसदी कम हुई है और दूसरी बात यह है कि देश अब क्रिकेट का वर्ल्ड चैंपियन है। इन दोनों बातों में एक कॉमन बात यह है कि इनमें युवा पीढ़ी का बड़ा योगदान है। जनगणना 2011 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक युवाओं की आबादी बढ़कर 45 प्रतिशत को पार करने की उम्मीद है। यानी तकरीबन आधे भारत को यंगिस्तान कहा जा सकता है। आने वाले दो साल में यह तेजी से पुरानी पीढ़ी को पीछे धकेल देगा। फिलहाल देश, समाज और परिवार का रिमोट कंट्रोल इसी पुरानी पीढ़ी के हाथों में है। जहां भी शिक्षित, नौकरीपेशा या कारोबारी युवा पीढ़ी ने समाज और परिवार की बागडोर संभाली है, वहां पुराने पड़ चुके सिस्टम के खिलाफ बगावत के सुर और नवाचार के तीखे तेवर साफ नजर आते हैं।
धोनी एंड कंपनी की वर्ल्ड कप जीत में भी यह बात नजर आई कि हमारे युवा खिलाड़ी अपने तरीके से खेलना चाहते हैं। उन्हें किसी की उंगली पकड़कर चलना पसंद नहीं। खेल के मूलभूत सिद्धांतों में नए जमाने के हिसाब से फेरबदल कर उन्होंने अपना तरीका खोज निकाला है, जो निश्िचत रूप से मैच जिताऊ है। इससे देश तो गौरवान्िवत हुआ ही, साथ में उस यंगिस्तान का नया चेहरा भी सामने आया जो पुरानी पीढ़ी से कुछ अलग, कुछ नया और कुछ बड़ा करने का हौसला रखता है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या उभरते हुए यंगिस्तान के इस चेहरे को एक नए भारत का पर्यायवाची मानना ठीक होगा ? हाथ में तिरंगा लहराते हुए जीत का जश्न मनाते यंगिस्तान में इतनी समझ और इतना कौशल है कि आगे चलकर देश को चलाने की चुनौती से निपट सके ? अगर इसमें अभी थोड़ा संशय नजर आता है तो निश्िचत तौर पर कहना होगा कि तस्वीर साफ नहीं है। तो फिर क्या होगी देश की दशा और दिशा ? आबादी के मामले में हम 2025 तक चीन को पीछे छोड़कर नंबर वन हो जाएंगे। यह जीत नहीं है, क्योंकि तब गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और असंतुलित विकास की चुनौतियां और मुश्िकल होंगी। पर एक अच्छी बात यह रहेगी कि भारत के पास और अधिक युवा कंधे होंगे, क्योंकि चीन की जनसंख्या वृद्धि दर एक फीसदी से भी कम है। नतीजतन वहां बुजुर्गों की आबादी लगातार बढ़ रही है।
असल में देश को इस समय ऐसे यंगिस्तान की जरूरत है जो भ्रष्टाचार और राजनेताओं के कुशासन के खिलाफ लड़ सके। दलगत राजनीति की खामियों को दूर कर कार्यपालिका को जनता के प्रति और जवाबदेह बना सके। इसके लिए जहां मुमकिन हो, पुरानी पीढ़ी को पीछे हटकर आगे का रास्ता साफ करना होगा। वर्ल्ड कप जीतने के बाद धोनी से अपना सिर मुंडवा लिया, क्योंकि उन्होंने मन्नत मांगी थी। और भी कई खिलाड़ियों ने ईश्वर से प्रार्थना की। साफ है कि नई पीढ़ी ने अपनी जड़ों, यानी सांस्कृतिक-धार्मिक परंपराओं से मुंह नहीं मोड़ा है- जैसा कि पुरानी पीढ़ी हमेशा आरोप लगाती रही है। उसके सामने अब कोई आदर्श नहीं है, क्योंकि पुरानी पीढ़ी ने ऐसे कोई आदर्श स्थापित नहीं किए। तो क्या धोनी एंड कंपनी की कामयाबी को युवा भारत, अर्थात यंगिस्तान के लिए नया आदर्श माना जाए ?
काफी हद तक यह मुमकिन है कि आने वाली पीढ़ी देश का नाम रोशन करने वाले ऐसे ही युवाओं को अपना आदर्श बनाएगी। इसलिए भी क्योंकि ये उन राजनेताओं, नौकरशाहों, सिर्फ अपने लिए लाखों रुपए कमाने व उड़ाने वाले कारोबारियों की औलादें नहीं हैं, जो शराब-शबाब के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। ये उन माता-पिता की संतानें भी नहीं हैं, जिनके दामन पर रिश्वतखोरी का दाग लगा है। बाप की बीएमडब्लू या महंगी एसयूवी पर सवार होकर नशे में लड़कियों को छेड़ने वाले उस युवा पीढ़ी के आदर्श कभी नहीं बन सकते, जिसके पास खोने को कुछ नहीं, पर छूने को सारा आसमां है।
तो क्यों न इस नवसंवत्सर के पहले दिन पुरानी पीढ़ी भी यंगिस्तान के बदलते चेहरे और उसकी सोच को एक नए सकारात्मक नजरिए से देखे और उसे लगभग 45 करोड़ युवाओं का आदर्श बनने का मौका दे। अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ खेल ही नहीं, बल्िक देश की प्रगति के हर मापदंड पर हम वर्ल्ड चैंपियन होंगे। ... और तब सड़कों पर हमेशा तिरंगा लहराता नजर आएगा। जय हो, इंडिया-इंडिया और वंदे मातरम के नारे तभी सही मायनों में सार्थक होंगे।

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