सरकार ने आखिर अन्ना हजारे की मांगें मान लीं और चार दिन से जारी उनका अनशन टूटा। जिन दो मांगों पर गतिरोध बना हुआ था, उन्हें सरकार ने एकाएक मान लिया, रातों-रात अधिसूचना प्रकाशित की गई और आज सुबह प्रधानमंत्री के बयान के बाद इसे अन्ना के प्रतिनिधि स्वामी अग्निवेश को सौंप दिया गया। इस तरह देश की आम जनता ने आजादी के बाद शासन की निष्क्रियता के खिलाफ छेड़ी दूसरी जंग शांतिपूर्ण तरीके से जीत ली। इसे जनतंत्र की जीत कहा जाए या फिर आधुनिक भारत के गांधी अन्ना हजारे के संकल्प की विजय, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये लड़ाई आगे भी जारी रह सकेगी ? लगातार खस्ताहाल हो रहा देश का प्रशासनिक तंत्र क्या अन्ना की इस लड़ाई से बदल पाएगा ? यह सवाल कल मेरी एक महिला पत्रकार मित्र ने पूछा था।
यह सवाल यहां उठना इसलिए लाजिमी है, क्योंकि देश में पहली बार सिविल सोसायटी और सरकार मिलकर नीतियां बनाएगी। जन संगठन या साफ शब्दों में कहें तो एनजीओ लोगों के हक की लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन वे सरकार को कभी इस तरह से नहीं झुका सके, जैसा कि अन्ना ने महज चार दिन में कर दिखाया। साफ तौर पर यहां छवि का भी सवाल है। सिविल सोसायटी के तकरीबन हर अभियान से लोग तो जुड़े पर उनकी आवाज दिल्ली तक नहीं पहुंच सकी। इसलिए, क्योंकि देश के मध्यम वर्ग ने उसमें सुर नहीं मिलाया। दरअसल यही मध्यम वर्ग सरकार को चलाता है, देश की समूची अर्थव्यवस्था इसी वर्ग की खपत पर टिकी है। अनशन के पहले दिन से अन्ना को सिविल सोसायटी से समर्थन दिया। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जन आंदोलन की खबर जब आग की तरह फैली तो अब तक सब-कुछ जानते समझते हुए भी सरकारी की नाकामियों को झेल रहा मध्यम वर्ग भी उठ खड़ा हुआ। हमें यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एक हफ्ते पहले ही भारत ने क्रिकेट का विश्व कप जीता है और यह खेल भी मुख्यत: मध्यम वर्ग का ही है। खुशी, हौसला और इस विश्वास से कि हां, हम किसी को भी झुका सकते हैं, मध्यम वर्ग हजारों की संख्या में सड़कों पर उतर आया।
शायद अन्ना ने भी इस सच्चाई को समझा है। इसीलिए उन्होंने अगली लड़ाई देश की चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए शुरू करने का ऐलान कर दिया है। विनोबा भावे ने एक बार कहा था कि अगर जन प्रतिनिधि जनता के भरोसे पर खरे न उतरें तो उन्हें वापस बुला लिया जाना चाहिए। राइट टू रीकॉल की यह व्यवस्था विनोबा युग के बाद कुछ स्थानों पर सामने आई है, पर एक कानूनी प्रावधान के बतौर नहीं। तो सवाल यह है कि अन्ना की अगली लड़ाई को इस मजबूत मध्यम वर्ग का कितना समर्थन मिलेगा ? फिलहाल अन्ना के पास इसका पुख्ता जवाब न हो, लेकिन वे जानते हैं कि अब देश की तस्वीर को तेजी से बदलने का वक्त आ गया है। यही वजह है कि वे जन लोकपाल बिल को संसद के आगामी मॉनसून सत्र में पारित करवाना चाहते हैं। अन्ना को मालूम है कि पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग ने अपने भरोसे का जो ब्लैंक चेक उन्हें थमाया है, उसे अधिकतम छह माह के भीतर ही कैश करवाना होगा। यह ‘फटाफट’ युग है। इसे जिंदगी का हिस्सा बनाने वाला मध्यम वर्ग ब्रांड इमेज और विश्वसनीयता का मुरीद है। भ्रष्टाचार का पोषण कालेधन को सफेद बनाने वाली ‘वॉशिंग मशीन’, यानी चुनाव प्रणाली से होता है, लिहाजा अन्ना ने इसे सुधारने का संकल्प लिया है। चुनाव प्रणाली में सुधार की मांग मध्यम वर्ग ने काफी पहले उठाई थी, लेकिन दलगत राजनीति के अपने स्वार्थ हैं। सो, सरकार ने पंचायती राज का ढिंढोरा पीटकर इसे खामोश करने की कोशिश की। लेकिन देखा जाए तो इस पूरी प्रणाली का सबसे बुरा असर ग्रामीण गरीब आबादी पर पड़ा है, जो आज भी अपने अधिकारों से वंचित है। सड़क, साफ पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और कुपोषण ने जितना गरीबों को प्रभावित किया है, उतना उस मध्यम वर्ग को नहीं, जो अपने जीने की जरूरतें कहीं न कहीं से पूरी कर लेता है। आने वाले छह माह में अन्ना अगर अपनी दूसरी जंग भी छेड़ देते हैं, तो मध्यम वर्ग भले ही उनके साथ हों पर समाज के उन गरीब, कमजोर तबके का क्या जो तकरीबन हर रोज भूखे पेट अनशन करने और इस व्यवस्था को कोसने पर मजबूर है ?
जाहिर है अन्ना की लड़ाई समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकी है। अगली लड़ाई में ऐसा न हो, इसके लिए अन्ना को अपने समर्थकों के साथ मिलकर जंतर-मंतर से बड़ा मैदान तैयार करना होगा। जंतर-मंतर से याद आया कि अन्ना के समर्थन में महाराष्ट्र का एक मजदूर भी अनशन पर बैठा था। इस मजदूर के पास मनरेगा का जॉब कार्ड था, लेकिन उसे दो साल में एक बार भी काम नहीं मिला। हालांकि, उसके नाम से कई अपात्र लोगों ने मजदूरी हथिया ली थी। इस मजदूर के परिवार में भूखों मरने की नौबत है। सो उसने सोचा कि घर पर भूखे मरने से बेहतर है कि अन्ना के साथ अनशन किया जाए। यही वह जज्बा है जो सिर्फ गरीब के भीतर नजर आएगा, क्योंकि उसके पास जीने व अपना आत्मसम्मान बचाने का इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं है। वह सरकारों का सबसे आसान वोट बैंक तो है, लेकिन इसके बदले में उसे पिछले 67 साल से कुछ नहीं मिला।
जंतर-मंतर में ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं थी, जो गांधी टोपी पहने हुए थे और जिस पर लिखा था ‘’ मैं अन्ना हूं ‘’। क्या वाकई ऐसा है ? कहीं यह उस ब्रांड का प्रतीक तो नहीं, जिसे मध्यम वर्ग को निशाना बनाकर बाजार ने खड़ा किया हो। बॉलीवुड के कुछ फिल्मकार और कथाकार शायद इस बारे में सोच भी रहे हों। लेकिन इस जंग को बिकाऊ मसाला बनाने से इसकी साख पर सवाल खड़े हो सकते हैं। ऐसा हुआ तो उस गरीब का भरोसा जुटाना और भी मुश्किल हो जाएगा, जो अब अपने ही समाज और व्यवस्था पर से विश्वास खो चुका है। अन्ना को यह भी सोचना है, क्योंकि समूचे देश की निगाहें उन पर टिक गई हैं, लोगों की उम्मीदें आसमान छू रही हैं। अन्ना को इस बात का पहले ही अहसास था और इसीलिए उन्होंने एक बेहद गरीब के हाथ से जूस का गिलास स्वीकार करने की घोषणा की थी, पर पीया एक नन्हीं बालिका के हाथों। जंतर-मंतर में उमड़ी हजारों की भीड़ में आम आदमी कहलाने वाला एक भी गरीब नहीं मिला। एक और नजरिया यह भी हो सकता है कि गरीबी अब एक समस्या ही नहीं, बल्कि राजनैतिक मुद्दा भी है और अन्ना इसे भी जानते हैं। वे अपने पूरे पत्ते अभी खोलना नहीं चाहते, सरकार को ऐसा कोई संकेत भी देना नहीं चाहते कि सामाजिक सरोकारों को राजनैतिक मुद्दा बनाना उनका मकसद है। ऐसा करने पर सरकार और दलगत राजनीति से उनकी सीधी भिड़ंत हो जाएगी और अन्ना ऐसा नहीं करना चाहते। पर क्या उनके साथ जुड़े संगठनों की सोच भी यही है ? जाहिर है, अभी लड़ाई लंबी चलेगी।

Sir I am agree with your views..but .One question is disturbing me will jan lok pal bill would be able to achive its aim...or became an apple of discord between civil society and government...we hv lots of with this bill .lets see it will fulfill or shatter...
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