अप्रैल 12, 2011

पूनम की आबरू क्यों बेचना चाहती है मीडिया ?

ग्‍लैडरैग्‍स मॉडल पूनम पांडेय यह कहकर फंस गई हैं कि वर्ल्‍ड कप फाइनल में भारतीय क्रिकेट टीम के जीतने पर वे न्‍यूड हो जाएंगी। यह टशन कुछ-कुछ ऑस्‍ट्रलियाई मैदानों पर 10-15 साल पहले के उन दृश्‍यों से मेल खाता है, जब अपनी टीम की जीत से रोमांचित कुछ दर्शक बिना कपड़ों के मैदान में उतर जाते थे। भारतीय मीडिया ने ऐसे सीन को दिनभर कैश करवाया था। हालांकि, पूनम ने यह वादा पब्‍लिसिटी के लिए किया था और जब टीम इंडिया वाकई में जीत गई तो इज्‍जत बचाने के लिए वह भाग खड़ी हुई। अब मीडिया ने उसे फिर पकड़ा है और पूछ रही है- ‘’ मैडम, आप न्‍यूड कब होंगी ?’’
ऐसा क्‍यों ?  पूनम की आबरू के पीछे क्‍यों पड़ी है मीडिया ? क्‍या वह सार्वजनिक जीवन में न्‍यूडिटी को बढ़ावा देना चाहती है ? ै ती  वजनिक जीवन में न्‍यूडिटि अगर ऐसा है तो क्‍या यह मीडिया का नैतिक पतन नहीं है ? नब्‍बे के दशक में ममता कुलकर्णी की टॉपलेस फोटो और फिर मधु सप्रे की लगभग न्‍यूड तस्‍वीरों पर भारी हल्‍ला मचा था। तब विरोध की शुरुआत मीडिया ने ही की थी, पर फायदा हुआ मैगजीन के प्रकाशकों को। ये पत्रिकाएं धड़ल्‍ले से बिकीं और इन अभिनेत्रियों के पोस्‍टर बॉयज हॉस्‍टलों से लेकर बेडरूम तक की शान बन गए। अब तो शराब कंपनियां और औरत की खूबसूरती के नाम पर टू-पीस में उनकी तस्‍वीरें कवर पेज पर छापने वाली ग्‍लैडरैग्‍स जैसी पत्रिकाएं बिना किसी रोक-टोक के न्‍यूडिटी का धड़ल्‍ले से प्रचार करती हैं, कैलेंडर तब बनते हैं। यह कुछ कंपनियों की व्‍यावसायिकता हो सकती है, पर मीडिया इसे फॉलो क्‍यों कर रही है ? अगर पूनम ने अपना वादा नहीं निभाया तो क्‍या ? प्रधानमंत्री से लेकर राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री और निगम पार्षद तक चुनाव से पहले आम जनता से कुछ ऐसा ही वादा करते हैं, पर मीडिया उसे पूनम की तरह फॉलो क्‍यों नहीं करती ? क्‍या वादाखिलाफी करने वाले देश के राजनेता आम जनता के सामने पूनम से कम नंगे हैं ?
वजह साफ है, नेताओं का नंगापन मीडिया के लिए बिकाऊ नहीं है, पर यदि वह पूनम के शरीर पर बचे चंद कपड़ों (ग्‍लैडरैग्‍स के कवर और किंगफिशर के कैलेंडर में पूनम ने इतने ही कपड़े पहने हैं) को भी उतरवा पाई तो उसकी जेब भर जाएगी। बरसों पहले आई मिथुन चक्रवर्ती की फिल्‍म ‘दलाल’ में राज बब्‍बर ने जो किरदार निभाया था, वह मीडिया की हालिया भूमिका से बेहद मेल खाता है। खासतौर पर वेब पत्रकारिता की दुनिया बड़ी तेजी से सैक्‍स, चटपटी खबरों, रेप और गरमा-गरम वीडियो में सिमटती जा रही है। नैतिकता और विश्‍वसनीयता के मामले में रेगिस्‍तान में तब्‍दील होते जा रही मीडिया की जमीन पर ये मसाले कैक्‍टस में उगे फूलों जैसे हैं। पूनम के बहाने मीडिया इस बहार को कायम रखना चाहती है, फिर चाहे इसके लिए उसे किसी भी हद से क्‍यों न गुजरना पड़े। लेकिन कैक्‍टस में कांटे भी होते हैं, जो इन ‘फूलों’ को तोड़ते समय हाथ में चुभ भी सकते हैं। लिहाजा मीडिया को नए हथकंडे अपनाने पड़ेंगे, उसे कैमरे के साथ बेडरूम तक में घुसना होगा, रेप का लाइव टेलीकास्‍ट करना होगा। औरत के जिस्‍म से सिर्फ कपड़े ही नहीं, बोटियां भी नोंचनी होंगी। क्‍या मीडिया ऐसा करेगी ? पूनम के मामले में उसकी हालिया भूमिका को देखकर तो यही लगता है कि वह ऐसा कर भी सकती है। क्‍यों, आपका क्‍या ख्‍याल है ?

1 टिप्पणी:

  1. Sir It was really shocking to see the media attention towards poonam pandey damatic episode...there are so many burning issues which require media attention but jai ho TRP ki...to get higher TRP they have no shame to do compromise with media ethices and busy to selling spicy news...and go below standards...

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