अप्रैल 15, 2011

छत्तीसगढ़ सरकार के मुंह पर सुप्रीम कोर्ट का दूसरा तमाचा



‘’जनता का स्‍नेह उन्‍हें कानून का डर दिखाकर हासिल नहीं किया जा सकता।’’
-          महात्‍मा गांधी

डॉ. बिनायक सेन को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई। छत्‍तीसगढ़ सरकार ने उन पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उन्‍हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्‍यीय बेंच ने कहा, ‘’सिर्फ नक्‍सली साहित्‍य रखने पर कोई नक्‍सली नहीं बन जाता। बिनायक नक्‍सलियों के हमदर्द भले हों, लेकिन उन्‍हें देशद्रोही कतई नहीं माना जा सकता।’’ किसी भी चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार (यहां संदर्भ छत्‍तीसगढ़ सरकार से है) के मुंह पर कोर्ट का इससे बड़ा तमाचा हो नहीं सकता। शायद अब राज्‍य के सीएम रमण सिंह दूसरी बार अपने गाल पर इसका दर्द महसूस कर रहे होंगे।
यह 24 दिसंबर 2010 की बात है, जब रायपुर के एडीशनल सेशन जज बीपी वर्मा ने बिनायक सेन को देशद्रोही ठहराया था। इस फैसले से समूचा कोर्ट रूम स्‍तब्‍ध था। बिनायक की दोनों बेटियों प्रांजिता और अपराजिता के आंसू नहीं थम रहे थे। लेकिन पत्‍नी इलीना ने कहा, ‘’यह समय रोने का नहीं है। मेरा गुस्‍सा मुझे आखिर तक इंसाफ की लड़ाई लड़ने को प्रेरित करेगा।’’ गरीबों में कुपोषण के कुप्रभाव पर एमडी करने वाले डॉ. सेन ने मध्‍यप्रदेश के रसूलिया में टीबी पर भी शोध किया था। यह भी प्रमुखत: गरीबों की ही बीमारी है। 1981 में सेन ने सक्रिय तौर पर आदिवासियों की बेहतरी के लिए काम करना शुरू किया। इसी दौरान वे पीपुल्‍स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज से भी जुड़े। इलीना के साथ मिलकर उन्‍होंने 90 के दशक में एक एनजीओ रूपांतर की नींव रखी। इस दौरान उनकी मां अनुसूया ने कई बार उन्‍हें एक पेशेवर डॉक्‍टर की नौकरी के विज्ञापन भेजे, लेकिन बिनायक कहते, ‘’गांव के गरीबों की सेवा मेरा मकसद है। मैं अपनी राह चुन चुका हूं।’’ ऐसा समर्पित व्‍यक्‍ति कैसे देशद्रोही हो सकता है ?
बिनायक सेन का कसूर क्‍या था ? सिर्फ इतना ही कि उन्‍होंने छत्‍तीसगढ़ सरकार के द्वारा बनाए गए सलवा जुडूम को मानवाधिकार विरोधी बताया ? रमण सरकार की यह वही फौज है, जिसने अब तक 644 गांवों को तबाह कर 60 हजार से ज्‍यादा आदिवासियों को उनकी जमीन से उजाड़ने का काम किया है। इसका सबसे ज्‍यादा फायदा राज्‍य सरकार को हुआ, जिसने खाली पड़ी जमीन खदान माफिया और औद्योगिक संस्‍थानों के हवाले कर दी। इन बेकसूर आदिवासियों का कोई रहनुमा नहीं था, पर बिनायक आगे आए, उन्‍होंने नि:स्‍वार्थ भावना से इस अत्‍याचार का विरोध किया। उसी समय राज्‍य के तत्‍कालीन डीजीपी ओपी राठौर ने खुलेआम मीडिया के सामने बिनायक को ‘’देख लेने’’ की धमकी दी थी। अंजाम वहीं पर तय हो गया था। 14 मई 2007 को गिरफ्तार होने के दो साल बाद 25 मई 2009 को सुप्रीम कोर्ट में जब मामला आया तो बिनायक को 40 सेकंड में जमानत मिल गई।
शुक्रवार 15 अप्रैल 2011 को सुप्रीम कोर्ट में फिर बिनायक को जमानत मिली है। रमण सरकार को इस दूसरे तमाचे के बाद होश आ जाना चाहिए। बस्‍तर के नक्‍सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के मोरापल्‍ल्‍ी, तिमापुर और तारमेटा जैसे आदिवासी बहुल गांवों में सीआरपीएफ और राज्‍य सरकार के कोबरा और कोया कमांडो दस्‍ते ने हत्‍या, बलात्‍कार, लूटपाट और आगजनी को अंजाम दिया। नक्‍सलियों से लड़ने के लिए रमण सरकार ने स्‍पेशल पुलिस अफसरों (एसपीओ) और कोया कमांडो के रूप में गुंडों की फौज खड़ी कर रखी है। इनमें से ज्‍यादातर पर बलात्‍कार और हत्‍या के आरोप हैं, पर पुलिस की नजर में ये भगोड़े हैं। यह दुनिया की ऐसी पहली अवैध फौज होगी, जिसे बलात्‍कार, लूटपाट और निहत्‍थे आदिवासियों की जान लेने के लिए सरकार से हर माह 3000 रुपए की तनख्‍वाह मिलती है। लोगों को सस्‍ता चावल बांटकर ‘’चाऊर वाले बाबा’’ का मुखौटा पहनने वाले रमण सिंह की असल छवि नरेंद्र मोदी से कहीं अलग नहीं है। क्‍या यह देशद्रोह नहीं है ? क्‍या यह सरकारी नक्‍सलवाद नहीं है ? नक्‍सली अगर छत्‍तीसगढ़ में भू-माफिया और आदिवासियों को उजाड़ने वाले औद्योगिक संस्‍थानों के विरोध में हथियार उठाए हुए है तो रमण सरकार अपनी ही प्रजा को उजाड़ रही है। इन कोया कमांडो और एसपीओ का बस्‍तर में इस कदर खौफ है कि लोग अपनी सारी कमाई को शरीर से बांधकर जीते हैं।
रमण के गुंडों की फौज आदिवासियों को नक्‍सल समर्थक बताकर उनकी जब चाहे जान ले लेती है, उनकी बहू-बेटियों को सरे बाजार निर्वस्‍त्र किया जाता है। लूटपाट के लिए महिलाओं के ब्‍लाउज तक फाड़ दिए जाते हैं। अब तो नक्‍सलियों को मार पाने में नाकाम सीआरपीएफ भी गुंडागर्दी के खेल में शामिल हो रही है। भाजपा के सुशासन और शुचिता के नारे का देशभर में तकरीबन यही हश्र है। मगर ‘’चाऊर वाले बाबा’’ और केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम को इससे क्‍या फर्क पड़ता है। उन्‍हें डर तो इस बात का है कि बिनायक सेन या स्‍वामी अग्‍निवेश जैसा कोई शख्‍स आदिवासियों के समर्थन में आगे न आ जाए। जाहिर है, बिनायक को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है। कदम-कदम पर उनके सामने खतरे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के लगातार तमाचों ने रमण सिंह का गाल यदि लाल किया है तो इसकी असलियत तेजी से देश के सामने आ रही है। इस जंग में बिनायक अकेले नहीं हैं। अगर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ पूरा देश एकजुट हो सकता है तो रमण सरकार के सरकरी आतंकवाद के खिलाफ भी लोग जुटेंगे। ... और तब सीएम के गालों की ‘’लाली’’ और भी देखने लायक होगी।

अहमदाबाद का सर्किट हाऊस, मार्च 1922 : महात्‍मा गांधी ने अपने ऊपर लगे देशद्रोह (सेक्‍शन 124ए आईपीसी) के जवाब में कहा था, ‘’यह नागरिक अधिकारों का दमन करने के लिए राजनेताओं का ब्रह्रास्‍त्र है। मुझे मालूम है कि भारत में यह ज्‍यादातर देशभक्‍तों के खिलाफ आजमाया गया है। इसलिए मैं देशद्रोह के इस आरोप को एक सम्‍मान मानता हूं।’’

1 टिप्पणी:

  1. विनायक सेन के केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई मायनों में बेहद खास है । जहां इसमें लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था की नई इबारत लिखी है। वहीं एक नई बहस को भी जन्म दिया है की राष्ट्रद्रोह की परिभाषा क्या हो? विनायक सेन या उनके जैसे समान विचार धारा वाले किसी भी व्यक्ति को केवल इस लिए राष्ट्रद्रोही का करार नही दिया जा सकता कि वह भ्रष्ट नीतियों की मुखाफलत करने वालो का समर्थन करते है। यह हमारे मौलिक अधिकारों का हनन है और यह लोकतंत्र नहीं कुतंत्र का परिचायक होगा। सरकार के पास आतंकवादी गतिविधीयों में लिप्त पाक से वार्ता करने के लिए वक्त भी है और चाहत भी है परंतु सरकार की नीतियों और व्यवस्था से नाराज हो हथियार उठा चुके नक्सलियों से बात कर उसका ठोस हल निकालने के लिए वह ज्यादा कटिबद्ध नजर नहीं आ रहे है, बल्कि उनके दमन के लिए लालायित है। सरकार अगर अब भी नहीं चेतती है तो उसके परिणाम काफी भयानक होंगे । खैर सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने आशा की एक किरण जरुर जगाई है।

    जवाब देंहटाएं