‘’सफर पर निकलने से पहले उस जगह के बारे में मालूम होना बहुत जरूरी है, जहां आप जा रहे हैं’’- ऐसा लोग कहते हैं। पर जिंदगी में सब-कुछ जमाने के कहे मुताबिक सीधा ही हो, यह भी जरूरी नहीं। हाल में उड़ीसा के सफर से लौटकर मुझे ऐसा ही कुछ महसूस हो रहा है। भुवनेश्वर से कहां जाना है किसी को नहीं मालूम, सिर्फ टैक्सी ड्राइवर के सिवा। एयरपोर्ट पर जब ये जनाब (नाम उड़िया में था, सो दिमाग से उतर गया) मिले तो बड़ी राहत मिली। थकान उतारने के लिए चाय पीने की हसरत हुई तो जनाब ने बड़े ही अक्खड़ अंदाज से कहा, शहर के अंदर जाओगे तो मंजिल तक देर से पहुंचोगे। लिहाजा हाईवे पर किसी टपरे के आने का इंतजार करो। सही भी है। शहर में इंसान भटक जाता है, भीड़ के बीच रेंगकर चलने लगता है। सारा झमेला विकास का है। आजादी के 65 साल बीतने पर भी हम शहर के यातायात को तेज नहीं बना सके हैं।
भुवनेश्वर में उतरने से ठीक पहले आसमां का मिजाज कुछ ऐसा था।
हमें अंदाजा हो गया कि मंजिल शहर से कई किलोमीटर दूर है। शायद नयागढ़ (स्थानीय भाषा में नुवागढ़ भी)। शाम के सात बजे थे। पूछा, कब तक पहुंचेंगे? जनाब बोले, सड़क बीच में खराब है, फिर भी तीन-साढ़े तीन घंटे में पहुंच ही जाएंगे। नौ बजे हमें (इंडिगो में हम चार लोग थे) हमारे प्रायोजक (एशियन ह्यूमन राइट कमीशन- एएचआरसी) की ओर से फोन आया कि देर हो रही है, सो खाना नयागढ़ में ही खा लें। एक घंटे बाद नयागढ़ आने पर सबसे बड़ा सवाल उठा कि किस साफ-सुथरे ठीए में खाया जाए। भोजन के अधिकार अभियान के सदस्यों के लिए भी यह एक बड़ा सवाल था, खासकर मेरे जैसे कमजोर पेट वाले व्यक्ति के लिए, जिसे भुवनेश्वर और पुरी की पिछली यात्रा अभी तक याद ? हो। खोजबीन करने पर एक ठीया मिला, खस्ताहाल पर लगा कि खाना मिल जाएगा। अगर आप शाकाहारी हैं तो भुवनेश्वर को छोड़कर बाकी सभी जगहों पर आपको ऐसी ही मशक्कत करनी होगी, क्योंकि ज्यादातर भोजनालयों में वेज और नॉन वेज एक साथ पकता है। दोनों के मसाले भी एक समान होते हैं। ऐसे में वेज खाने पर भी लगता है मानों नॉन वेज खा रहे हों। मेन्यू में ज्यादा विकल्प नहीं होते और उड़िया न जानने के कारण आप उन्हें समझा भी नहीं सकते कि आखिर आप खाना क्या चाहते हैं।
आम से लदे पेड़।
वेटर अपनी समझ के अनुसार एक थाली में परवल की सब्जी (दिखने में बड़ी अजीब), दाल और रोटी ले आया था। उड़ीसा में आपको रोटी थोड़ी मोटी मिलेगी, इसलिए मंगवाते समय संख्या का ध्यान रखना जरूरी है, वरना खाना फिकेगा जो हम जैसे एक्टिविस्ट लोगों को कतई मंजूर नहीं। एक बात और, बंगाल का पड़ोसी राज्य होने के कारण उड़ीसा में दोनों राज्यों की भाषाओं का मेल ही नहीं, बल्कि मसालों में भी काफी समानता है। खैर, बंगाली होने के बावजूद मेरा पेट मध्यप्रदेश का है, साथ ही मेरे तीन दोस्तों (इनमें से एक मेरे जैसे ही आधे बंगाली) का भी यही हाल था। लेकिन भोजन का हक तो निभाना था, सो थोड़ा-बहुत खाया और आगे बढ़े। नयागढ़ से रास्ता गांवों के बीच होकर जाता है, लिहाजा हर गांव के पहले और आखिरी सिरे के बीच आपको स्पीड ब्रेकर (रफ्तार तोड़क) मिल जाएंगे। वो भी ऐसे कि पूरी गाड़ी के परखच्चे हिल जाएं। गाड़ी की हेडलाइट में मौका मुआयना किया तो पता चला कि ये गांव में ही बनी स्वदेशी तकनीक है, प्रशासन का इस मामले में कोई हाथ नहीं। स्टेट हाईवे की तेज रफ्तार ट्रैफिक से लोगों, बच्चों को बचाने का सभी को हक है। सरकार कुछ नहीं करती तो लोगों ने ही ऐसे स्पीड ब्रेकर लगाने का फैसला किया, खालिस देसी मिट्टी से। विकास की अंधी रफ्तार को थामने की यह एक सामुदायिक कोशिश है। रास्ते में ड्राइवर ने बताया कि यह नक्सली इलाका है, पर वारदातें करीब 300 किलोमीटर दूर मलकानगिरी में ज्यादा होती हैं, जो आंध्रप्रदेश की सीमा पर है।
नयागढ़ से 40 किलोमीटर (भुवनेश्वर से 127 किलोमीटर दूर) ड्राइवर ने एक दुकान में पूछा, ये संभव का फार्म हाऊस कहां है ? जवाब मिला, तीन किलोमीटर दूर। आगे बढ़े तो दूर सड़क के एक किनारे पर टॉर्च जलती-बुझती नजर आई। हममें से एक ने कहा, कहीं नक्सली तो नहीं ? मुझे छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जाते समय ऐसा तजुर्बा हो चुका है। हालांकि, वे हमारे प्रायोजक थे, जो पथप्रदर्शक बनकर खड़े थे। घुप्प अंधेरे में कार हमें वहां छोड़कर निकल गई और हम उन चार लोगों के साथ बैग उठाकर जंगल (रात को तो यही लग रहा था, पर था वह फार्म हाऊस) में अंदर चलते गए। मन में सवाल उठ रहा था कि यहां जंगल में क्यों ? शहर में क्यों नहीं ? कम से कम बिजली तो होती।
10 मिनट के बाद हम छोटे-छोटे गेस्ट हाउस के सामने थे। वहां दक्षिण कोरिया की जू जिन, हांगकांग की मरियम और एएचआरसी के बीजो फ्रांसिस ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया। साथ में हिदायत भी दी कि सात को बिना टॉर्च के न चलें, क्योंकि कोबरा पर पैर पड़ने का डर है। बेहद चिपचिपे, नम वातावरण में ये सांप अपने शिकार (इंसान नहीं) की खोज में होते हैं। टॉर्च हममें से किसी के पास नहीं था और थकान इस कदर कि इस खतरे की परवाह भी नहीं थी। जंगल के जीवन में खुद को समाहित करने के लिए इससे बेहतर और कुछ नहीं कि आप बुरी तरह से थक जाएं। फिर आपको आसपास की हर चीज अच्छी लगने लगेगी।
ऐसे होती है जैविक खेती।
सुबह उठे तो आसपास नजर आए, आम, कटहल, नींबू, पपीते, नारियल के विशाल पेड़। लगा जैसे इंद्र के नंदन कानन में आ गए हैं। कोयल की कूक, पक्षियों का चहचहाना और लाल-काली चींटियों, मकड़ियों की व्यस्त दिनचर्या। यह था 90 एकड़ में फैला संभव का फार्म हाउस। संभव संस्थान के मौजूदा संचालक रामकृष्ण ने बताया कि पहले यह बेकार, बंजर जमीन थी। महज 1000 रु. प्रति हेक्टेयर के दाम पर टुकड़ों-टुकड़ों में यह जमीन खरीदी गई। पुरी के प्रो. राधामोहन ने आठ मार्च 1989 (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन) में संभव की स्थापना कर यहां जैविक कृषि शुरू की। इस तरह जिस जमीन पर कुछ भी नहीं उगता था, वहां पिछले 22 साल में प्रतिमाह पांच लाख से ज्यादा की आय देने वाला बगीचा बन गया।
जैविक खेती के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले लोगों के लिए यह एक सबक है। रासायनिक उर्वरकों ने मिट्टी की क्षारीयता को बढ़ाकर उसके पोषक तत्वों को खत्म कर दिया। तेजी से कृषि उत्पादन बढ़ाने और मुनाफा कमाने की इस बाजारवादी सोच ने किसानों को पहले तो खूब फायदा दिया, लेकिन अब वे इसका दुष्प्रभाव झेल रहे हैं। उनकी जमीन खेती के लायक नहीं रही। जहां फसल उग रही है, वहां भी कीटनाशकों के ज्यादा उपयोग से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। फसल उत्पादन की लागत बढ़ने से किसान को खेती का कोई फायदा नहीं मिल रहा है। सरकार चावल पर प्रति क्विंटल 1100 रुपए समर्थन मूल्य देती है, पर प्रति एकड़ लागत आती है लगभग 25000 रुपए के लगभग। अगर एक एकड़ में 80 से 120 क्विंटल के करीब उत्पादन हो तो सारे खर्च निकालने के बाद किसान के हाथ में आते हैं 40 से 45 हजार रुपए। पेशे से शिक्षक रामकृष्ण बताते हैं कि यही खेती अगर जैविक तरीके से की जाए तो उत्पादन लागत आधी हो जाती है। इस नामुमकिन से काम को मुमकिन कर दिखाया है संभव ने। इस फार्म हाऊस में हमने जगह-जगह एक घेरे में पत्तियों का ढेर देखा, जो जैविक खाद बनाने की परंपरागत तकनीक रही है। इसके अलावा वर्मी कल्चर जैसी कुछ नई तकनीकें भी हैं, जो खाद बनाने के काम आती हैं। महाराष्ट्र में किसानों की कोऑपरेटिव्स ने इस तरह की जैविक खेती को लोकप्रिय किया जरूर है, पर वहां के किसानों पर जीएम व हाइब्रिड बीजों की मार पड़ी है। बहरहाल, रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रकोप से जमीन की उर्वरता खत्म होने से परेशान उड़ीसा भर के किसान और पर्यावरणविद संभव के फार्म हाऊस का अध्ययन करने आते हैं। संभव ने किसानों को यह भी सिखाया है कि वे बाजार से बीज न खरीदकर अपने तैयार किए बीजों का आपस में बंटवारा करें। रामकृष्ण का मूल मंत्र है कि कुदरत ही अपने आप में शिक्षक है। वैसे तो इस बात को सभी मानते हैं, पर करते अपने मन की हैं। कुदरत को खुली चुनौती देने की आदत जो है इंसान को ? हालांकि इस कोशिश में उसे यह नहीं समझ आता कि प्रकृति की मार सहने की उसमें अभी ताकत नहीं आई है। उसे तो खुले आसमान के नीचे और जमीन के ऊपर ही रहना है। संभव के फार्महाऊस में धूम्रपान, शराब पीने और मांसाहार की सख्त पाबंदी है। मेरे साथ गए एक साथी ने गलती से सिगरेट पी लिया तो उन्हें चेतावनी मिल गई। फार्म हाऊस में मोबाइल नेटवर्क ठीक से काम नहीं कर रहा था, लिहाजा परिंदों की भरमार थी। अमूमन शहर में यह नही दिखता। क्या बढ़ते मोबाइल टॉवर इसकी वजह नहीं हैं ?
जैविक भोजन।
संभव के इस फार्महाऊस में हम इकट्ठा हुए थे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों के दस्तावेजीकरण की तकनीकी जानकारी के लिए। पहले सत्र में जब सभी 30 प्रतिभागियों से परिचय हुआ तो पता चला कि हमें जंगल में बने इस फार्महाऊस में क्यों लाया गया था। असल में हमारे बीच एक प्रतिभागी (मलकानगिरी से आए) थे, जिन्हें सरपंच के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत करने पर पुलिस और सीआरपीएफ ने नक्सली होने का ठप्पा लगा दिया था। आंध्रप्रदेश ले जाकर उन पर कई तरह के अत्याचार किए गए। पैरों के नाखून निकाले गए, पेट, कंधे पर चाकू से कट लगाया गया। यह उगलवाने के लिए कि वे नक्सली हैं। फिर सेना के जवानों की पोशाक में उनकी तस्वीर खिंचवाई, ताकि यह साबित किया जा सके कि वे वाकई एक नक्सली हैं। नाकाम रहने पर उन्हें जेल में डाल दिया गया। पांच महीने बाद वे आंध्र हाईकोर्ट से मिली जमानत पर जेल से छूटे हैं। मानवाधिकार की परिभाषा में सभी बराबरी से सम्मानपूर्वक जीवन जीने के हकदार हैं। लेकिन मानवाधिकार हनन की घटनाओं का विरोध करने वाले आदिवासियों को किस तरह नक्सली का तमगा पहनाया जा रहा है, इसका यह जीवंत प्रमाण है। मेरे एक करीबी मित्र, जो एक बड़े अखबार के संपादकीय प्रभारी हैं, माह में एक बार अज्ञात खुफिया सूत्रों के हवाले से मध्यप्रदेश में नक्सलियों के पकड़े जाने या नक्सली गतिविधियों की अपुष्ट खबरें देते हैं। जाहिर तौर पर ये खबरें उन्हीं खुफिया सूत्रों (मुख्यत: आईबी) से मिलती हैं, जिन्हें यही सिखाया गया है कि तंत्र का विरोध करने वाले सभी लोग नक्सली हैं। इनमें एक डीआईजी स्तर की अधिकारी भी हैं, जो सिविल सोसायटी के कुछेक लोगों से गाहे-बगाहे यह उगलवाने की कोशिश करती हैं कि उनका नक्सलियों से कोई रिश्ता है। मलकानगिरी के इस शख्स ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सरकार नक्सलवाद को नहीं, ‘’नक्सलियों’’ को खत्म करने की कोशिश में है।
मानवाधिकारों पर चिंतन मनन।
बहरहाल, दूसरे दिन का कार्यक्रम एकाएक वर्कशॉप के रूप में बदल गया, क्योंकि इसका प्रमुख एजेंडा मानवाधिकार हनन के दस्तावेजीकरण की तकनीक को लेकर था। वैसे तो मीडिया में हम इस तरह की तकनीक का उपयोग रिपोर्टिंग टूल के रूप में कई बार कर चुके हैं, लेकिन घटना को एक नए नजरिए से देखने की कोशिश नयापन लिए थी। दस्तावेजीकरण भी असल में रिपोर्टिंग जैसा ही है, पर सिविल सोसायटी इसे काफी विस्तृत रूप में गहराई से करती है। मेरे विचार से मीडिया के लोगों को भी इसे जरूर सीखना चाहिए, ताकि मामले की गंभीरता से वाकिफ हुआ जा सके। वर्कशॉप का तीसरा दिन पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, अफगानिस्तान, ब्रिटेन और हांगकांग में मानवाधिकार हनन की घटनाओं के अनुभवों से भरा था। भोजनावकाश के बाद हम वापस रवाना हुए।
भुवनेश्वर एक अच्छा शहर है। शुभालक्ष्मी के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में इसे काफी संवारा गया है। चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर, मॉल, चमकती दुकानें और जींस-टीशर्ट में घूमते लोग। हालांकि ग्रामीण परिवेश का पैबंद भी बीच-बीच में नजर आ जाता है। शहर के हर मकान में कम से कम दो पेड़ हैं, नारियल और आम का पेड़ हर जगह नजर आता है। गर्मी के दो महीनों को छोड़कर बाकी समय काफी नमी रहती है, शहर की हरियाली का राज यही है। सड़क पर आपको लीची, आम, केले और अन्य मौसमी फल बिकते नजर आएंगे। उड़ीसा का संबलपुरी प्रिंट देशभर में लोकप्रिय है। हां, पुरी (भुवनेश्वर से 100 किमी) जाएं तो कोणार्क जरूर देखें। रास्ते में आपको सड़क पर ही उड़ीसा की हस्तकला के शानदार नमूने बेहद सस्ते दाम पर मिल जाएंगे। ज्यादातर दुकानदार इन्हें गांवों से खरीदकर वातानुकूलित एंपोरियम में चौगुनी कीमत पर बेचते हैं। लिहाजा बांस, लकड़ी या धातु के हस्तशिल्प को खरीदते समय इसका ध्यान रखें, वरना ठगे जाएंगे।






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