जून 11, 2011

फेसबुक पुराण



नामी-गिरामी संस्‍थान से एमबीए पास करने वाली एक बालिका से इंटरव्यू में पूछा गया ‘’आप खाली समय में क्‍या करती हैं ? ’’ नैन मटकाते हुए उस बालिका ने जवाब दिया, ‘’chatting on facebook.’’। उस एक जवाब ने बॉस को इस कदर मंत्रमुग्‍ध कर दिया कि उसे फौरन नौकरी दे दी। इस प्रसंग से मुझे अमोल पालेकर की सुपरहिट फिल्‍म गोलमाल का वह सीन याद आ गया, जिसमें बॉस उत्‍पल दत्‍त नौकरी पर रखने से पहले भेजा फ्राई करने वाले सवाल करता है। काश! अपने जमाने में भी फेसबुक जैसा महापुराण होता तो मटरगश्‍ती और खेलकूद में वक्‍त बर्बाद करने की बजाय हम भी चैटिंग में माहिर हो जाते। 

खासकर गर्मी की छुट्टियों में, जब सारा वक्‍त क्रिकेट और कॉमिक्‍स पढ़ने में गुजरता था। बंगाल में ननिहाल जाते तो वहां के हमउम्र छोकरों से बेलाग दोस्‍ती कर समय काटने का इंतजाम कर लेते। कॉलेज पहुंचे तो दोस्‍तों के साथ बाजार घूमने और फिल्‍में देखने का सुरूर चढ़ा। घरवालों ने कहा कि लड़का अब गया काम से, पर नौकरी की जद्दोजहद ने सब सुधार दिया। लेकिन फेसबुक ने बड़ों को ही नहीं, बच्‍चों को भी सुधार दिया है। मेरे एक मित्र का 12 साल का बेटा हमसे ही चैटिंग करता है, उल्‍टे-सीधे किस्‍म के सवाल पूछता है। टालने की कोशिश करो तो कहता है, ‘’मैं बड़ा हो गया हूं, लिहाजा छिपाने की कोशिश मत करो।’’ एक बार मैंने उसकी वयस्‍कता की परीक्षा लेने के लिए पूछा, ‘’क्‍यों छोटे साहब, कितनी गर्लफ्रेंड बनाई ?’’ तो जवाब में सवाल पूछा गया, ‘दिन की या रात की ?’ जाहिर है, पापा देर रात को आते हैं और मम्‍मी को बेटे पर इसलिए नाज है क्‍योंकि वह ‘कंप्‍यूटर एक्‍सपर्ट’ है। जय हो फेसबुक की, जिसने एक सोशल नेटवर्किंग साइट को टाइम मशीन बना दिया।

यह मशीन भी ऐसी कि इसमें बड़े बैठें तो बचकानेपन पर उतर आएं और बच्‍चे एकाएक वयस्‍क जैसी बातें करें। ‘दिल तो बच्‍चा है जी, दिल दीवाना, पागल....न जाने क्‍या हो रहा है’ जैसी फिजूल की बातें। जिंदगी के वनडे में आखिरी ओवर काफी संभलकर खेलना चाहिए, खासकर तब जबकि खाते में रन कम हों। लेकिन कुछ लोग समझते ही नहीं। रोमांटिक कवितानुमा तुकबंदी, आपत्‍तिजनक फोटो और यहां-वहां से चुराई हुई पोस्‍टिंग्‍स में समय कट जाता है। उधर बच्‍चों ने भी कार्टून, गेम्‍स, वीडियो से बैर लेकर फेसबुक को अपने फायदे के लिए इस्‍तेमाल करना सीख लिया है। मेरे एक परिचित की 13 वर्षीय बेटी ने किसी अन्‍य खूबसूरत लड़की का प्रोफाइल फोटो और भ्रामक जानकारियां डालकर मुझे फ्रेंड का प्रस्‍ताव किया। हालांकि इन्‍फो (इतनी तकनीकी जानकारी तो शायद आपको होगी ही) में उसने अपने नाम और शहर के बारे में सही लिखा। सो पकड़ में आ गई। मैंने उसे मैसेज किया, आप फौरन फेसबुक से बाहर हो जाएं वरना घर पर खैर नहीं। दो दिन के बाद उसके पापा का फोन आया, ‘क्‍या बताऊं यार, मां-बेटी दोनों को फेसबुक की लत लग चुकी है।’ मैंने पूछा, ‘तुम्‍हारा क्‍या हाल है ?’ जवाब मिला, अभी जल्‍दी में हूं। शाम को फेसबुक पर मिलता हूं।

फेसबुक युवाओं के लिए किसी आकाशगंगा में विचरण करने जैसा है। मेरे एक मित्र की ताजा पोस्‍टिंग : ‘मेरा कुत्‍ता भी फेसबुक पर है।’ गोया वे अकेले काफी नहीं थे कि अपने कुत्‍ते को भी आकाशगंगा की सैर पर ले गए। इस साइट पर आपको यूजर्स प्रोफाइल पर सांड, गाय, बैल, भेड़, बकरी, बिल्‍ली, कुत्‍ते और न जाने कैसे-कैसे फोटो मिल जाएंगे। ये प्राणी केवल अपनी बिरादरी वालों से ही दोस्‍ती व जानकारियां शेयर करते हैं। जाहिर है, इनकी भाषा व भावनाओं को वही समझ सकते हैं। भावनाओं की बात हुई तो फेसबुक पर दो तरह की बिरादरी मिलेगी। एक वे जिनकी टांग कब्र पर लटकी है, पर ज्ञान का कीड़ा अक्‍सर दुम से होते हुए नाक तक आ जाता है। दूसरे वे, जो बेशर्म मक्‍खी की तरह कहीं भी बैठ जाएंगे। इन्‍हें लाख भगाओ, कुछ भी करो, ये भिनभिनाना नहीं छोड़ते। फेसबुक का सार्थक मकसद के लिए उपयोग करने की इच्‍छा रखने वाले मेरे जैसे लोग इनके लिए गुड़ की तरह हैं। किधर से भी आकर या तो चिपक जाएंगे या अपनी बकवास को भिनभिनाकर व्‍यक्‍त करेंगे। एक तीसरी बिरादरी भी तेजी से पनप रही है। ये कॉर्पोरेट किस्‍म के संक्रामक मच्‍छर होते हैं (मिसाल के लिए किसी अखबार या संस्‍थान का कोई ग्रुप)। एक बार इनसे चिपके तो आपको टाइफाइड, मलेरिया और पेचिश जैसी बीमारियां तय है। ये अक्‍सर गंदगी, सड़कों के गड्ढे, पानी, भ्रष्‍टाचार  सरीखे मुद्दों पर फिजूल की राय देंगे, पर समाधान इनके पास नहीं है। ये रोज आपको घिसी-पिटी तान में अपनी विज्ञापननुमा प्रस्‍तुति भी दे सकते हैं, ताकि इनकी मौजूदगी की आपको सनद रहे। 

फेसबुक ने ऐसे लोगों को अपना ज्ञान बघारने का पूरा मौका दिया है। 2जी घोटाला, ग्रेटर नोएडा में जमीन अधिग्रहण का गंभीर मसला हो या फिर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अण्‍णा व बाबा रामदेव के अनशन का मुद्दा, हर विषय पर इनके ज्ञान का कीड़ा कंप्‍यूटर के की-बोर्ड से होकर तारों से रेंगता हुआ पहले कैलिफोर्निया (फेसबुक का सर्वर यहीं पर है) और फिर हवाई रास्‍ते से होकर आपके कंप्‍यूटर तक पहुंच ही जाता है। इन फिजूल की दलीलों का विरोध करना इनके मानवाधिकार का उल्‍लंघन है। बिना पढ़े-समझे ये अपनी बात बेबाक तरीके से कह देते हैं। न विषय विशेषज्ञता का बंधन और न ही मर्यादाओं का। ऊपर से भावनाओं का ज्‍वार इस कदर उमड़ता है कि शरीर का गुरुत्‍वीय बल भी उसे नहीं संभाल पाता। एक बालिका (बच्‍ची नहीं) पिछले एक माह से तकरीबन रोजाना नए एंगल से अपनी तस्‍वीरें पोस्‍ट करती है और जवाब में लार टपकाते कमेंट्स बटोर रही है। सोशल नेटवर्किंग का ऐसा इस्‍तेमाल देखकर मैट्रिमनी साइट्रस वाले सोच में पड़े होंगे। 

फिर भी फेसबुक से नाता तोड़ पाना आसान नहीं। इस बाजारवादी व्‍यवस्‍था ने इसकी भी लत लगा दी है। भोजन का समय एक-दो घंटे पीछे खिसक गया है। टीवी पर कौन-कब आ रहा है, किसका बर्थडे है, किसी शादी कैसे हुई और कौन-कहां पर है सब जानकारियां इसी पर मिल जाती है। साथ में नई-पुरानी खबरें और चैटिंग का लुत्‍फ अलग। पर प्‍लीज! मुद्दे की बात करो दोस्‍तों। सार्थक बहस करो। अपने कुत्‍ते-बिल्‍लियों को घर पर रखो। इस साइट के खोजकर्ता मार्क इलियट जुकरबर्ग को ‘इडियट’ मत बनाओ। उसने हमें जोड़ने के लिए एक मंच दिया है, इसे देश, प्रदेश और अपनी बेहतरी के इस्‍तेमाल करो। इश्‍क, रोमांस के लिए चैटिंग सुविधा है न? उसे इस्‍तेमाल करो, हमें नहीं।

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