जून 29, 2011

सत्‍यम्‍मा की मौत से उठे सवाल...


सत्‍यम्‍मा नहीं रहीं। उसे मैं नहीं जानता, वह मेरी कुछ लगती भी नहीं थीं। फि‍र भी फर्क पड़ता है, क्‍योंकि‍ वह एक गरीब वि‍धवा महि‍ला थी, जि‍सने पति‍ की मौत के बाद हालात से जमकर संघर्ष कि‍या। लेकि‍न इस समाज, इसकी व्‍यवस्‍थाओं और तंत्र की वि‍संगति‍यों से वह हार गईं और अपनी 14 और आठ साल की दो बेटि‍यों के साथ अमोनि‍यम फास्‍फेट जहर खा लि‍या। कर्नाटक के चि‍त्रदुर्ग की रहने वाली सत्‍यम्‍मा का पति‍ ऑटो ड्राइवर था। उसकी मौत के बाद सत्‍यम्‍मा को कुली का काम करना पड़ा, लेकि‍न गुजारे के लि‍ए यह काफी नहीं था। कर्ज से परेशान होकर वह बैंक से लोन लेने पहुंची, लेकि‍न वहां जवाब मि‍ला कि‍ वह इसलि‍ए खाता नहीं खोल सकतीं, क्‍योंकि‍ वे गरीब हैं। क्‍योंकि‍ सत्‍यम्‍मा बेहद गरीब थीं, इसलि‍ए उनकी मौत की खबर शायद ही कि‍सी अखबार में छपी और अगर छपी भी हो तो कि‍सी कोने में चार लाइन से ज्‍यादा की नहीं होगी। सवाल यह पैदा होता है कि‍ सत्‍यम्‍मा की मौत का जि‍म्‍मेदार कौन है ?  हम, हमारा नि‍ष्‍ठुर समाज या नि‍रंतर खत्‍म होती हमारी सामुदायि‍क भावना। यह सवाल भी बेहद प्रासंगि‍क है कि‍ अगर सत्‍यम्‍मा आज शहर में न रहकर कि‍सी गांव में होती तो क्‍या उसे खाने के लाले पड़ते ? नि‍श्‍चत रूप से वह उसी ग्रामीण समाज से आकर शहर में बसी होगी। उसके पारि‍वारि‍क उत्‍तराधि‍कार, तमाम रि‍श्‍ते-नाते, सहयोग, व्‍यवहार सभी चि‍ता में स्‍वाहा हो गए। साथ में एक मां की जि‍म्‍मेदारि‍यां भी, जि‍सकी कसक उनकी आत्‍मा पर कई जन्‍मों तक बनी रहेगी। उनकी दो बेटि‍यों को इस बात की उम्‍मीद होगी कि‍ ईश्‍वर दोबारा उन्‍हें ऐसा जन्‍म न दे कि‍ पालने से उतरते ही खाने के लाले पड़ने लगे।

इस घटना ने मुझे इसलि‍ए और भी झकझोरा, क्‍योंकि‍ बीते कुछ दि‍नों में कई कार्यशालाओं में कुछ बड़े ही दि‍लचस्‍प अनुभव हुए। कुछ ऐसी बातें भी सुनने को मि‍लीं, जि‍नसे लगातार संकुचि‍त और बाजारवादी होती जा रही मीडि‍या की सोच साफ झलकती है। मन बहुत ही उद्वेलि‍त है, लि‍हाजा कुछ गांठें आपके सामने रखने पर मजबूर हूं।

सत्‍यम्‍मा की मौत कई सवाल छोड़ गई है। ये सवाल जि‍तना हमारे लि‍ए अहम है, उससे कहीं ज्‍यादा गंभीर है देश को चलाने वाले उन नेताओं के लि‍ए जो आजादी के बाद आधी आबादी को सत्‍यम्‍मा जैसी हालत से उबारने में नाकाम रहे हैं। इसके कई कारण हैं। पहला तो यह कि‍ देश में सामाजि‍क सुरक्षा के रूप में कोई पुख्‍ता योजना नहीं है। खासतौर पर कमजोर तबके के लोगों के लि‍ए, जि‍न्‍हें श्रम करके गुजारा करना पड़ता है। हाथ-पैर से लाचार हो जाएं तो पूरा परि‍वार भूखों मरने की कगार पर आ खड़ा होता है। ऐसे में काम आती है पीडीएस यानी राशन प्रणाली और अंत्‍योदय अन्‍न जैसी योजनाएं। कम से कम इससे खाने को अनाज तो मि‍लता है। शायद सत्‍यम्‍मा इसकी पहुंच से भी बाहर थीं। महि‍लाएं अब भले ही पुरुषों की बराबरी कर रही हों, पर सच तो यह है कि‍ मजदूरी के मामले में उनके साथ पुरुषों से कमतर व्‍यवहार कि‍या जाता है। अगर पुरुषों को 150 से 200 रुपए मजदूरी मि‍लती है तो महि‍लाओं को 70-80 रुपए से ज्‍यादा नहीं दि‍ए जाते। बतौर कुली सत्‍यम्‍मा दि‍नभर में शायद ही 60 रुपए से ज्‍यादा कमा पाती हों। इस रकम से तीन सदस्‍यीय परि‍वार का गुजारा मुमकि‍न नहीं है। वि‍धवा व नि‍राश्रि‍त पेंशन की दावेदारी कानूनी दस्‍तावेजों से नि‍कलकर ज्‍यादातर लोगों तक नहीं पहुंचती है। खासतौर पर उन हि‍तग्राहि‍यों तक तो बि‍ल्‍कुल नहीं, जि‍नके सि‍र पर कि‍सी का हाथ नहीं होता। बैंक कर्ज नहीं देते, इसलि‍ए नि‍जी साहूकारों के आगे हाथ फैलाना मजबूरी है जि‍स पर 42 फीसदी तक (ज्‍यादातर चक्रवृद्धि‍) ब्‍याज देना पड़ता है। एक गरीब वि‍धवा महि‍ला के लि‍ए क्‍या इतना ज्‍यादा ब्‍याज चुका पाना मुमकि‍न है ? क्‍या हमें सत्‍यम्‍मा जैसी महि‍लाओं की मुश्‍कि‍लों से कोई फर्क पड़ता है ? महि‍ला ने दो बच्‍चों के साथ जान दी, मां ने बच्‍चों के साथ जहर खाकर जान दी, जैसी खबरें आए दि‍न पढ़ने को मि‍लती है। लेकि‍न हमारी संवेदनाएं उसी समय खत्‍म हो जाती है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि‍ क्‍यों, कौन, कि‍स वजह से और कौन है इसका जि‍म्‍मेदार।

ऐसी है हमारी विधायिका - 

अब देखते हैं कि‍ हमारे सांसदों-वि‍धायकों को इन घटनाओं से कि‍तना फर्क पड़ता है। विधानसभा की कार्यवाही के विभिन्‍न विषयों को निपटाने के लिए एक नहीं 17 समितियां होती हैं। इसके बावजूद सत्‍यम्‍मा जैसी महिलाओं की मौत से जुड़े सवाल छूट जाते हैं। क्‍यों ? एक वर्कशॉप में बड़ी दिलचस्‍प जानकारी मिली कि सदन की आश्‍वासन समिति कभी भी सरकार से मिले आश्‍वासनों का फॉलोअप नहीं करती। संसद, विधानसभा में सरकार गाहे-बगाहे आश्‍वासन देती है और इन्‍हें सत्र की समाप्‍ति के बाद ही भुला दिया जाता है। ठीक यही हाल पुस्‍तकालय समिति का है, जिसे लाइब्ररी में पुस्‍तकों की उपलब्‍धता से कोई लेना-देना नहीं है। सबसे दिलचस्‍प जानकारी तो इन समितियों के गठन को लेकर मिली। इसमें कहा गया कि आम लोगों के सरोकारों से जुड़े सवाल पूछने वालों को सदन की अहम समितियों में जगह शायद ही मिल पाती है। अगर मिल भी गई तो बैठकों में इनकी एक नहीं चलती। तो सवाल यह है कि विपक्ष की सदन में भूमिका क्‍या है ?

कार्यशाला में एक पूर्व विधायक ने अपने अनुभवों के आधार पर बताया कि यह सब सेटिंग का खेल है। विपक्ष के सांसद-विधायक सत्‍ता पक्ष के साथ मिलकर चलने में यकीन रखते हैं। उन्‍हें देशहित या राज्‍यव्‍यापी मुद्दों से कोई मतलब नहीं, वे सिर्फ अपने क्षेत्र के मसलों पर ध्‍यान देते हैं। वजह साफ है, उन्‍हें अपने क्षेत्र के लोगों के काम करवाने होते हैं। अगर सत्‍ता से मिलकर नहीं चलेंगे तो काम कैसे होंगे? तो ज्‍यादातर सवाल अपने क्षेत्र विशेष से जुड़े होते हैं, ताकि कार्रवाई हो और अपनी जनता का हित सधे, बाकी जाएं भाड़ में। विधायिका में करीब 95 फीसदी जनप्रतिनिधि व्‍यापक मसलों पर सवाल नहीं पूछते।

एक और दिलचस्‍प बात यह कि सदन में सवालों की भी लॉटरी खुलती है। सत्र के शुरू होने से 21 दिन पहले पूछे गए सवालों की पर्चियां बनाकर उन्‍हें रोजाना संसदीय मंत्रालय के किसी अधिकारी के मार्फत लॉटरी के रूप में निकाला जाता है। सबसे पहले जो पर्चियां निलकती हैं, उन्‍हें तारांकित और बाकी सवालों को अतारांकित मानकर एक घंटे के प्रश्‍नकाल को निपटाया जाता है। तारांकित का मतलब यह कि सरकार के मंत्री विभागवार इन सवालों का खुद खड़े होकर जवाब देंगे, जबकि अतारांकित सवालों का जवाब सांसदों-विधायकों को सीधे भेजा जाता है। निर्वाचित जनप्रतिनिधि दबी जुबान में यह आरोप लगाते हैं कि लॉटरी की इस प्रक्रिया में रोजाना धांधली होती है, ताकि सरकार को घेरे जाने वाले सवालों को रोका जा सके। अगर सवाल टेढ़े हों, इनसे सरकार के माथे पर बल पड़ रहे हों तो फिर एक शब्‍द का जवाब तय होता है, ‘’इस संदर्भ में जानकारी जुटाई जा रही है।’’ यह जानकारी सरकार के पांच वर्षीय कार्यकाल में शायद ही मिलती है, क्‍योंकि इसका फॉलोअप करने वाला कोई नहीं होता, यहां तक कि वे मीडियाकर्मी भी नहीं, जो दिनभर सदन में बैठे रहते हैं।

एक नजर इधर भी....

देश के 50 धनाढ्य परि‍वार भारत की 40 फीसदी पूंजी के मालि‍क हैं। इनमें से शीर्ष 20 घराने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के 85 प्रति‍शत हि‍स्‍से को नि‍यंत्रि‍त करते हैं। वि‍श्‍व बैंक का आकलन है कि‍ गरीबों के लि‍ए राशन दुकानों से बंटने वाला 70 प्रति‍शत अनाज लीकेज और भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ जाता है। देश की 74 प्रति‍शत ग्रामीण महि‍लाएं खून की कमी और 54 प्रति‍शत से अधि‍क बच्‍चे कुपोषण के शि‍कार हैं। इसका सीधा मतलब है कि‍ दो ति‍हाई महि‍लाएं कठि‍न परि‍श्रम नहीं कर पातीं और 54 फीसदी कुपोषि‍त बच्‍चे आगे चलकर श्रम नहीं कर सकेंगे। देश की आधी आबादी को स्‍वस्‍थ जीवन के लि‍ए जरूरी 2100 से 2400 कैलोरी भोजन नहीं मि‍ल पाता।

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