गाँव की सड़क
शहर को जाती है,
शहर छोड़कर
जब गाँव
वापस आती है
तब भी
गाँव रहता है वही गाँव,
शहर को जाती है,
शहर छोड़कर
जब गाँव
वापस आती है
तब भी
गाँव रहता है वही गाँव,
कांव-कांव करते कौओं का गांव।
- केदारनाथ अग्रवाल, रचनाकाल: 10-01-1980
पिछले 21 साल में यह तस्वीर काफी बदल चुकी है। प्रधानमंत्री सड़क योजना के जरिए गांव से जुड़ी सड़क जब गांव वापस आती है तो ढेर सारी चीजें बदल जाती हैं। इस योजना के तहत गांव की संपर्क सड़क इसलिए बनाई गई थीं, ताकि शहरों से निकली विकास की गंगा गांवों की ओर रुख कर सके। लेकिन अब ऐसे पहुंच मार्गों के इर्द-गिर्द ढेर सारी दुकानें, ढाबे, होटल वगैरह खुल गए हैं। तो धींगामस्ती करनी हो या चाय पीनी हो, गांव के लोग साइकिल या ट्रैक्टर से वहां आ जाते हैं। गांव में दूध, फल-सब्जियों की कमी हो चली है, क्योंकि सुबह शहर के लोग बड़ी गाड़ियों में आकर इन्हें सस्ते में खरीदकर ऊंचे दाम पर बेचते हैं। शहर से दूर पर सड़कों के किनारे संभ्रांत परिवारों के लोगों ने किसानों से जमीनें खरीदकर अपने फार्म हाऊस बना लिए हैं। पीछे की दो-तीन एकड़ जमीन खेती के काम आती है और जो कुछ पैदा होता है उससे इन धनाढ्य लोगों के गोदाम भर जाते हैं। कहीं फोर लेन तो कहीं सिक्स लेन सड़क बनते देखकर बड़े किसानों ने लैंड बैंक बनाना शुरू कर दिया है। अपने ही गांव-बिरादरी के किसानों को पटाकर वे औने-पौने दाम में जमीन खरीदकर रख रहे हैं, ताकि सरकार के भूमि अधिग्रहण के समय मुनाफा कमाया जा सके।
गांव का अनपढ़ रमतू पहले शहर जाने से डरता था, अब हफ्ते में तीन रोज बाजार घूम आता है। घर की छोटी-मोटी चीजें, पत्नी की बिंदी, गुड़िया की फ्रॉक और खिलौने शहर में अच्छे मिल जाते हैं। सुबी मोटरसाइकिल से गए और शाम तक लौट आए। बीच में एकाध फिल्म देख ली, नैन मटक्का कर लिया। लौटते वक्त अंग्रेजी दारू जरूर साथ होता है। घर पर टीवी है, डीवीडी है और अब तो ‘ठंडे’ के लिए फ्रिज भी खरीद लिया है। गर्मी के मौसम में शाम अच्छे से गुजर जाती है। लाइट रहे या नहीं, मोबाइल हमेशा चलता है। उसमें गाने भी बजते हैं। बड़ा बेटा आठवीं में पढ़ रहा है। अगले साल से उसे शहर के स्कूल में दाखिल करवाने का मन बनाया है। वहां पढ़कर वह इंग्लिस बोलेगा। इंग्लिस जरूरी है तरक्की के लिए, यह बात रमतू ने शहर जाकर समझी है। बेटे के गांव आने पर कुनबे और बिरादरी में धाक जमेगी सो अलग। ये वे छोटे-छोटे सपने हैं जो रमतू जैसे हजारों ग्रामीण बरसों से देखते आ रहे हैं। लेकिन शहर कैसेट जाएं, न जाने वहां कैसेट रहेंगे, क्या होगा, हिचक के ये कारण हिचकी बनकर गांववालों के पेट में अब तक फंसे रहे। अब जाकर मध्यप्रदेश सरकार उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण को जिस कदर उतावली है, उससे किसानों के लिए जमीन की कीमत अब सोने से भी ज्यादा है। चाहे उड़ीसा में पॉस्को का मामला हो या फिर जैतापुर एटॉमिक पावर प्लांट का मसला, सभी जगह किसान औने-पौने दाम पर अपनी जमीन सरकार के हवाले नहीं करना चाहते। मीडिया ने जमीन अधिग्रहण के मसले को कुछ इस तरह से पेश किया है कि तमाम राज्य सरकारें विलेन बन चुकी हैं। सड़क ने भोले-भाले ग्रामीणों को सरकार और निजी कंपनियों के मुनाफे का गणित समझा दिया है। जो नहीं समझे, वे अपनों और परदेसियों से ठगे जा रहे हैं। मिसाल के लिए भोपाल से 75 किलोमीटर दूर होशंगाबाद जाएं तो वहां आपको सड़क के किनारे की सारी जमीनें पंजाब से आए सिख किसानों की खरीदी हुई मिलेंगी। पंजाब के किसान तेजी से नर्मदा किनारे की उपजाऊ जमीनें खरीद रहें हैं, क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बेतरतीब इस्तेमाल से उनके प्रदेश की जमीनें तकरीबन बंजर हो चुकी हैं।
नर्मदा किनारे आकर बसे इन सिख किसानों को नई जमीन से कोई लगाव नहीं। वे तो बस उसे इतना उलीचना चाहते हैं कि अपने प्रदेश में हुए घाटे की भरपाई की जा सके। भरपूर उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल और सालभर में तीन से चार फसल, सिख किसान यहां आकर बेहद खुश हैं। स्थानीय किसानों ने भी इनसे खेती का ककहरा सीख लिया है। होशंगाबाद और आसपास के क्षेत्रों में जहां सालभर में बमुश्किल दो फसल ही पैदा हो पाती थी, अब तीन फसलें, सब्जियां और दलहन की खेती भी हो रही है। लेकिन मूल सवाल अभी भी जस का तस है कि अगर इन किसानों की जमीनें उद्योगों को दे दी गईं तो अनाज कौन और कहां पैदा करेगा ? यह सवाल इसलिए भी अहम है कि कोई इस बारे में सोचना ही नहीं चाहता, न मीडिया और न ही आम लोग। औद्योगिक विकास के लिए जमीन जरूरी है, पर साथ ही भूखे पेट को अनाज की भी जरूरत है।
गांव की सड़क ने लोगों को जमीन का वास्तविक मोल रुपए-पैसे की बाजारवादी भाषा में तो समझा दिया है, पर किसानों ने फिलहाल यह नहीं सोचा कि जमीन अधिग्रहण के बदले मिली मोटी रकम का वे क्या करेंगे ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि सालों-साल हल चलाकर अन्न पैदा करने वाला किसान लाखों की रकम का क्या करेगा ? आज गांवों में हर दो-तीन मकानों के बीच जहां बाइक्स खड़ी नजर आती है, जमीन छिन जाने के बाद उन्हीं विस्थापित परिवारों में कारों का काफिला नजर आएगा। मुआवजे की रकम से आलीशान कोठी, जेवरात और बच्चों की महंगी शादियां तो हो सकती हैं, लेकिन वह संतोष कहां मिलेगा, जो दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद गांव के कच्चे-पक्के मकान में रुखी-सूखी खाकर मिलता था। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और पीएम के सलाहकार कौशिक बसु को इस बात का अंदाजा नहीं हो सकता, क्योंकि वे शायद ही कभी गांव गए हों। शहर की आबोहवा में संयुक्त परिवार टूटेंगे, जमीन-जायदाद के झगड़े बढ़ेंगे और आसमान छूती युवाओं की हसरतों को पूरा करना किसान के लिए और मुश्किल हो जाएगा। उसे फिर आत्महत्या को मजबूर होना पड़ेगा। तब सरकार यह कहकर मुआवजा नहीं देगी कि यह तो परिवार के अंदर की बात है। यह सबक सड़क तब सिखाएगी, जब वह गांव से शहर की ओर जाएगी। फर्क सिर्फ इतना रहेगा कि वही सड़क वापस गांव नहीं ओर नहीं आएगी, क्योंकि गांव ही नहीं बचेगा।

very nice article...फर्क सिर्फ इतना रहेगा कि वही सड़क वापस गांव नहीं ओर नहीं आएगी, क्योंकि गांव ही नहीं बचेगा its touching..in the storm of modernization v r getting seperated from our roots..our identity..
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