बचपन में हम राशन दुकान जाते थे। घासलेट, शकर, गेहूं लाने। अब नहीं जाते। हमारे पास राशन कार्ड नहीं, पैन कार्ड है, ड्राइविंग लाइसेंस है। हम गरीब नहीं रहे या गरीबी की रेखा (बीपीएल) से बाहर हो गए। कैसे, कब, क्यों ? यह पता नहीं। पर भूख अभी भी लगती है, कभी-कभी आंतें कुलबुलाती हैं। घर-बाजार हर जगह भोजन उपलब्ध है। कहीं थोड़ी देर लगती है तो कहीं झट-पट मनचाहा भोजन मिल जाता है। हां, इन 25-30 साल में भोजन तक हमारी पहुंच बढ़ी है।
तो इसका सीधा अर्थ हुआ कि जिनकी भोजन तक आसानी से पहुंच नहीं है, जो भोजन (चाहे वह किसी भी स्वरूप में हो) खरीद नहीं सकते, वे गरीब हुए। मेरे समान उन्हें भी भूख लगती है, पर उनकी हांडी हमारे जैसी भरी हुई नहीं है। सवाल यह उठता है कि ऐसे में राशन दुकान से वे क्या खरीदते होंगे ? कुपोषण से कैसे बच पाते होंगे ? हमारे समय में तो राशन दुकान से खाने का तेल भी मिलता था, अब सभी को बाजार से ऊंचे दाम पर खरीदना पड़ता है। हमारे समय में (तब मैं रायपुर में रहा करता था) सब्जियों की कीमतें भी पहुंच में हुआ करती थीं। अगर नहीं होती तो शायद हम कुपोषित होते। अब पांच लोगों के सामान्य परिवार को सब्जी खरीदने में रोजाना कम से कम 50 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। दूध का पैकेट 22 रुपए का पड़ता है। एक लीटर खाद्य तेल (सस्ते से सस्ता ब्रांड) 50 रुपए से ज्यादा का मिलता है। पांच लोगों के परिवार में यह शायद एक हफ्ते ही चल पाता होगा। दालों के दाम चौगुने हो चुके हैं। तो एक गरीब परिवार 3000-3500 रुपए प्रतिमाह की आय में सिर्फ राशन दुकान के गेहूं-चावल, घासलेट और शकर के सहारे क्या पूरा पेट भर सकता है ? पोषण की कमी को पूरा कर सकता है? अभी इस विश्लेषण में ऐसी कई चीजें नहीं जुड़ी हैं, जिनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मसलन, साबुन, दवाएं, शिक्षा का खर्च, कपड़े, अन्य आकस्मिक खर्च वगैरह।
मूल सवाल आय का है। योजना आयोग यह मानता है कि 578 या इससे ज्यादा की मासिक आय वाला परिवार किसी भी सूरत में गरीब नहीं है। उसने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि भाड़ा, परिवहन, शिक्षा, दवाओं और खाद्यान्न जैसी जरूरी चीजों पर माहभर में 110 रुपए खर्च करने वाला परिवार गरीबी की रेखा से बाहर माना जा सकता है। हां, इस नाते मैं गरीब नहीं हूं। परंतु क्या महज 110 रुपए में किसी परिवार का महीने भर का खर्च चल सकता है ? केवल 18 रुपए में स्कूली बच्चे का कंपास बॉक्स भी नहीं आएगा (ध्यान रखें कि सरकार सिर्फ मुफ्त में कॉपी-किताबें ही देती है, बैग-कंपास नहीं)। रहा सवाल दवाओं का तो योजना आयोग ने इसके लिए सिर्फ 25 रुपए रखे हैं। दीनदयाल कार्ड वाले किसी गरीब शख्स से पूछिए, वह बताएगा कि मुफ्त दवा के नाम पर भी 100-150 रु. खर्च करने ही पड़ते हैं।
तो पैसे आएंगे कहां से ? आय बढ़ेगी कैसे ? प्रति एकड़ फसल पर सरकार से मिलने वाले समर्थन मूल्य के मुकाबले लागत तीन गुनी हो चली है। फसल अच्छी हुई तो घर में अनाज रहता है, लेकिन मौसमी आफत या सूखा पड़ने की सूरत में किसान के लिए भी मजदूरी के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं रहता। खेतिहर मजदूर या सिर्फ मजदूरी के सहारे ही गुजर-बसर करने वालों की बात करें तो 150-200 रुपए की मजदूरी रोज नहीं मिलती। अगर तीन माह काम किया तो दो माह फाके भी पड़ते हैं। सरकार कहती है, हम हर माह 25-35 किलो राशन दे रहे हैं ना? लेकिन यह कौन सोचे कि उस अनाज को पकाने के लिए ईंधन और बाकी चीजें मसलन तेल-सब्जियां कहां से आएंगी ? यह सोचे बगैर ही सरकार की सबसे बड़ी सलाहकार समिति यानी एनएसी ने नए खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंजूरी दी है। यह जानते-समझते हुए भी कि मौजूदा राशन वितरण व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।
फिर नया बिल क्यों ?
भूख और कुपोषण से निपटने के लिए केंद्र सरकार के अधीन 22 कल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं। राज्य अपने स्तर पर भी योजनाएं चला रहे हैं। इसके बावजूद रोजाना 5000 बच्चों की मौतें कुपोषण के चलते हो रही हैं। सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि देश में गरीबों की वास्तविक संख्या या अनुपात क्या है। गरीबी की रेखा कहां से शुरू होकर किस जगह खत्म होती है। गरीब के निर्धारण के लिए आय सीमा क्या हो ? तेंडुलकर और सेनगुप्ता कमेटी के पास हाल में सुप्रीम कोर्ट की वाधवा कमेटी ने कहा है कि रोजाना 100 रुपए से कम कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे माना जाएगा। केंद्र इस साल जातिगत जनगणना के साथ बीपीएल सर्वे का काम भी शुरू कर रहा है। इसके लिए प्रारूप फार्म भी तैयार हैं, लेकिन इन सभी को देखने पर यह साफ नजर आता है कि गरीबी, गरीब, भूख और कुपोषण के प्रति सरकार की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। वह अभी भी भ्रष्टाचार, लीकेज के दीमक से नष्ट हो चुकी राशन वितरण प्रणाली के जरिए ही लोगों को अनाज मुहैया कराने को ही अपनी जिम्मेदारी मानती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोगों को भूख से निजात दिलाना सरकार की ही संवैधानिक जिम्मेदारी है। इस खानापूर्ति के साथ योजना आयोग ने यह भी कहा है कि उसे तेंडुलकर कमेटी 37 फीसदी वाली गरीबी की रेखा ही पसंद है, सेनगुप्ता समिति की 77 फीसदी वाली रेखा नहीं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि सरकार के पास दोनों रेखाओं की परिधि में आने वाले गरीबों को खिलाने के लिए 1.10 लाख करोड़ रुपए नहीं है। हालांकि यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा है कि उद्योगों को मंदी से उबरने के लिए दिए गए 3.5 लाख करोड़ रुपए के स्टिम्यूलस यानी प्रोजेक्ट (जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन पैसा इसलिए दिया गया, क्योंकि यूपीए को दूसरी बार सत्ता में लाने में उद्योगों ने मंदी के बावजूद दिल खोलकर पैसा दिया था) के लिए धन कहां से आ गया ? और क्या करोड़ों को भूखे पेट को भरना पहले जरूरी है या उद्योगों को मंदी से उबारना ? धन की कमी का बहाना बनाकर अब सरकार नए बिल में बीपीएल परिवारों को 35 के बजाय 25 किलो अनाज देने की बात कर रही है, यानी गरीबों की थाली से भोजन निकालकर सरकार अपनी झोली भरेगी।
नए बिल में 90 फीसदी ग्रामीण परिवारों और 50 फीसदी शहरी गरीबों को पीडीएस के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। इसके लिए 70 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे, जो 35 किलो के हिसाब से अनाज बांटने के लिए जरूरी 1.10 लाख करोड़ रुपए से कहीं कम है। वैसे इस रकम को वित्त वर्ष 2011-12 के लिए उद्योगों को मिलने वाले करों व अन्य रियायतों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो रकम बढ़कर 6.5 लाख करोड़ रुपए हो जाती है। देश के नीतिकार और उदारीकरण के समर्थक इसके समर्थन में यह कह सकते हैं कि गरीबों का पेट भरने से जीडीपी नहीं बढ़ता या निर्यात नहीं बढ़ेगा, लेकिन उद्योगों को रियायतों के तोहफे देश में विकास को और बढ़ाएंगे। असल में यह सोच थोड़े समय के लिए ही सही साबित हो सकती है, क्योंकि भूख और कुपोषण के चलते लगातार कमजोर हो रही देश की श्रम शक्ति आने वाले वर्षों में काम करने लायक भी नहीं रह जाएगी। तब इंडिया और भारत के रूप में देश के दो हिस्से साफ नजर आएंगे, जहां एक ओर शहरी शिक्षित नौकरीपेशा तबका होगा और दूसरी ओर भुखमरी के कगार पर खड़ा जीर्ण-शीर्ण ग्रामीण समाज।
संसाधन जुटाने होंगे
सरकार यदि वाकई ग्रामीण भारत को भूख और कुपोषण से निजात दिलाना चाहती है तो उसे जल, जंगल और जमीन पर आजीविका के संसाधनों का विकास करना होगा। ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो-कुटकी, कंद-मूल और वनोपज पर ग्रामीण समाज की निर्भरता लगातार खत्म होती जा रही है। सरकार की भू-अधिग्रहण नीति, कृषि को अनुत्पादक मानकर अनदेखा करने, रासायनिक खाद व कीटनाशकों के अधिक उपयोग को बढ़ावा देने जैसी नीतियों को खत्म कर परंपरागत कृषि को संवारना होगा। सरकार ने इसी साल भू-अधिग्रहण विधेयक (संशोधन) लाने का ऐलान किया है। उसमें यह देखना होगा कि कृषि कार्यों के लिए आवंटित उपजाऊ जमीन उद्योगों को न दी जाए। सिर्फ रेल लाइनों और सिंचाई के साधन विकसित करने के मकसद से ही जमीनों का अधिग्रहण हो। लोगों को भूख से बचाना केंद्र और राज्य सरकार दोनों की ही जिम्मेदारी है। लेकिन एक ऐसी वितरण व्यवस्था, जिसका 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा लीकेज और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है, इस संवैधानिक जिम्मेदारी को निभाने की दिशा में कतई उपयुक्त नहीं हो सकती। किसानों को राहत दिलाने के लिए सरकार को गांवों में माइक्रोफाइनेंस व्यवस्था को भी मजबूत बनाना होगा। फिलहाल साहूकारों से कर्ज लेने पर 18 से 44 फीसदी तक ब्याज चुकाना पड़ता है, जबकि यह किसी भी सूरत में छह फीसदी से कम नहीं होना चाहिए। लेकिन इस बात में संदेह है कि गांव, गरीबी और कृषि को अनुत्पादक मानने वाली सरकार और उसके नीति निर्धारक असल भारत की दुश्वारियों को समझकर सही नीति बनाने में कामयाब होंगे।
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